विभाजिन कालीन भारत के साक्षी: मुस्लिम दंगे : कुछ तथ्य

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मुस्लिम दंगे : कुछ तथ्य

            15 अगस्त 1947 को देश का विभाजन हो गया और पाकिस्तान नाम से एक नया शत्रु-राज्य भारत के नक्शे पर उभर आया। इस विभाजन-काल में लगभग बीस लाख लोगों को अपने प्राण गँवाने पड़े, अरबों की सम्पत्ति जला दी गई, अरबों की सम्पत्ति लूट ली गई। हिन्दू महिलाओं का शीलभंग, हिन्दू युवतियों का अपहरण हुआ। लगभग दो करोड़ लोगों को अपने घर छोड़ कर विस्थापित होना पड़ा।

            विभाजन की इस त्रासदी के बारे में जब कोई बात करता है तो आमतौर पर यही कहता है कि हिन्दू और मुसलमान दोनों ही एक दूसरे के खून के प्यासे हो रहे थे, दोनों ही तरफ़ पशुता का नंगा नाच हो रहा था, दोनों में ही मनुष्यता का लोप हो गया था।

            क्या वास्तव में यह बात दोनों तरफ़ थी? नहीं, यह पूरा काण्ड एकतरफा था। इसके परीक्षण के लिये निम्नलिखित तथ्यों की ओर ध्यान देना आवश्यक है।

  1. भारत-विभाजन की नींव तो कांग्रेस ने 1916 में ही रख दी थी, जब उसने मुस्लिम लीग को मुसलमानों की प्रतिनिधि संस्था मान लिया था और उससे लखनऊ-पैक्ट कर लिया।
  2. इसके बावजूद कांग्रेस अपने आपको हिन्दू और मुसलमान दोनों की प्रतिनिधि संस्था कहती रही। यदि वह दोनों की प्रतिनिधि संस्था थी तो उसने मुस्लिम लीग को मुसलमानों की प्रतिनिधि संस्था क्यों मान लिया था?
  3. दोनों की प्रतिनिधि संस्था कह कर कांग्रेस अपने आज को भी धोखा देती रही और हिन्दू समाज को भी। किन्तु मुसलमान इस धोखे में कभी नहीं आए। वे कांग्रेस की इस दुविधा का लाभ उठाते रहे और अपनी शक्ति बढ़ाते रहे। कांग्रेस हिन्दू मुस्लिम एकता की बीन बजाती रही। हिन्दू उस पर मुग्ध होते रहे। इस का परिणाम—
  4. इस हिन्दू-मुस्लिम एकता के सबसे पहले शिकार हुए मलाबार (केरल) के हिन्दू। मोपला मुसलमानों ने वहाँ के हिन्दुओं पर जमकर आक्रमण किये। ‘सर्वेंट्स आफ़ इंडिया सोसायटी’ की जाँच के अनुसार इस काण्ड में 1500 हिन्दुओं की हत्या की गई, 20,000 हिन्दू बलपूर्वक मुसलमान बना लिए गए और लगभग तीन करोड़ की सम्पत्ति लूटी गई।
  5. 1922 में इन मुस्लिम दंगों की लपेट में अमृतसर, लाहौर, पानीपत, मुलतान, मुरादाबाद, मेरठ, इलाहाबद, सहारनपुर, गुलबर्गा और दिल्ली भी आ गए। इनमें से अधिकांश स्थानों पर मुसलमानों ने मुहर्रम का जलूस निकालते समय हिन्दू मुहल्लों पर आक्रमण किये। सबसे भयंकर स्थिति सहारनपुर में हुई, यहाँ की जाँच करने के लिए बाद में भाई परमानन्द जी गए थे।
  6. 1924 में कोहाट (उत्तर-पश्चिम सीमा प्रान्त) में दंगे किये गए। यहाँ हिन्दू केवल 5% थे। पट्टाभि-सीतारामैय्या के अनुसार वहाँ 150 हिन्दू मारे गए। शेष हिन्दुओं को वहाँ से 200 मील दूर रावलपिण्डी में जाकर शरण लेनी पड़ी।
  7. 1931 में बनारस, मिर्जापुर, आगरा, तथा कानपुर तथा अन्य अनेक स्थानों पर मुस्लिम दंगे हुए। कानपुर में ज्यादा भीषण हुए। 23 मार्च 1931 को भगतसिंह को फाँसी दी गई थी। देश भर में उस दिन हड़ताल हुई। कानपुर में हिन्दुओं ने दूकानें बन्द कीं, मुसलमानों ने नहीं कीं। 23 रात को मुसलमानों ने हमले शुरु कर दिए। उसी रात लगभग 50 हिन्दू घायल या मारे गए। 24 को हिन्दुओं की दूकानें लूटनी शुरु हो गईं और 25 मार्च को अग्निकाण्ड चालू हो गए। दूकानों और मन्दिरों में आग लगा दी गई और वे जल-जव कर खाक हो गए। लगभग 500 परिवार अपने घर छोड़ कर आस-पास के गाँवों में जा बसे। सरकारी अनुमान के अनुसार 166 व्यक्ति मरे और 480 घायल हुए। इसी दंगे में प्रताप के सम्पादक और उ. प्र. कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गणेश शंकर विद्यार्थी भी मारे गए थे। उनकी लाश चार दिन बाद मिली थी। 
  • उन दिनों मुसलमान नेता आमतौर पर चुनौती दिया करते थे—‘हो जाए चौथा पानीपत।‘ इसका मुँह तोड़ उत्तर दिया था महामना मदनमोहन मालवीय जी ने—‘तो फिर हो जाए, देर कैसी?’
  • लेकिन कांग्रेस ने ‘चौथा पानीपत’ की चुनौती स्वीकार करने की बजाए मुसलमानों के प्रति घुटने-टेक नीति को अपनाया। कांग्रेस की इस कायरता ने मुस्लिम गुंडापन में अभिवृद्धि की।
  • कांग्रेस की दुर्बलता को देखते हुए 1940 में मुस्लिम लीग ने स्पष्ट रूप से ‘पाकिस्तान’ की माँग का प्रस्ताव पास कर दिया। मजेदार बात यह कि इस पूरे प्रस्ताव में ‘पाकिस्तान’ शब्द कहीं नहीं था।
  • सिन्ध पहले मुम्बई प्रान्त का भाग था। मुस्लिम बहुल प्रान्त बनाने के लिये मुस्लिम लीग ने सिन्ध को मुम्बई प्रान्त से अलग करने की माँग रखी। कांग्रेस ने भी इस माँग को समर्थन दे दिया। फलतः 1937 में सिन्ध अलग मुस्लिम-बहुल प्रान्त बन गया। 1939 में इसमें व्यापक मुस्लिम-दंगे हुए, जिसमें 150 हिन्दू मारे गए।
  • कांग्रेस के आशीर्वाद से बनी इसी सिन्ध की विधान-सभा ने 3 मार्च 1943 को पाकिस्तान की माँग अधिकृत रूप से की। एक भी मुस्लिम विधायक (कांग्रेसी भी) ने इसका विरोध नहीं किया। विरोध केवल हिन्दू विधायकों ने ही किया। इसी सिंध की सरकार ने जून 1943 में स्वामी दयानन्द के ‘सत्यार्थ प्रकाश’ ग्रन्थ पर प्रतिबन्ध लगाया।
  • ‘सत्यार्थ प्रकाश’ पर प्रतिबन्ध के बारे में जब केन्द्रीय असेम्बली (दिल्ली) में भाई परमानन्द ने स्थगन-प्रस्ताव रखा तो कांग्रेसी सदस्य गूँगे व बहरे बने रहे। समर्थन के अभाव में प्रस्ताव गिर गया।
  • 1942 के आन्दोलन में प्रायः सभी कांग्रेस नेता गिरफ्तार कर लिये गए थे। 1944 में जेल से रिहा होने के बाद 9 सितम्बर से 27 सितम्बर तक गान्धी जी बिना निमन्त्रण के जिन्ना के घर के चक्कर लगाते रहे। 19 दिन तक चले इस वार्तालाप का एक ही परिणाम हुआ कि जिन्ना मुसलमानों का एकमात्र नेता और बेताज बादशाह स्वीकार कर लिया गया। जिन्ना-विरोधी विभिन्न मुस्लिम गुटों ने भी जिन्ना को धीरे-धीरे अपना नेता स्वीकार कर लिया। 1916 में कांग्रेस ने मुस्लिम लीग को मुसलमानों की एकमात्र प्रतिनिधि संस्था स्वीकार किया था, तो 1944 में जिन्ना को मुसलमानों का एकमात्र नेता।
  • इस एक मात्र नेता के नेतृत्व में विभिन्न मुस्लिम नेताओं ने अपना असली हिन्दू-विरोधी रूप दिखाना शुरू किया। 10 अप्रैल 1946 को फिरोज खाँ नून (जो बाद में पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री भी रहे) ने कहा—“हम मुसलमान जो अनर्थ करेंगे, वह इतना भयानक होगा कि उसके सामने चंगेखाँ और हलाकू द्वारा हुए कत्ले-आम जैसे कारनामे भी फीके पड़े जाएँगे।“
  • 27 जुलाई 1946 को मुम्बई में मुस्लिम लीग ने ‘पाकिस्तान के अपने राष्ट्रीय लक्ष्य’ के लिये जूझने का संकल्प लिया और इस हेतु सीधी कार्रवाई (डायरेक्टम एक्शन) दिवस 16 अगस्त को मनाने का निर्णय किया। जिन्ना ने कहा—“मुस्लिम लीग के पूरे जीवन-काल में हम क्या करते रहे? हम केवल संवैधानिक उपायों की बातें करते रहे….आज हमने संवैधानिक उपायों को तिलांजालि दे दी है।“
  • 16 अगस्त 1946 को इस ‘सीधी कार्रवाई’ का भीषणतम रूप दिखा कोलकाता में। यह पाँच दिन चला और इसमें 10,000 से अधिक नर-नारी तथा बच्चे मारे गए, 15,000 बुरी तरह से घायल हुए तथा एक लाख लोग बेघर-बार हो गए।
  • इस ‘सीधी कार्रवाई’ का दूसरा अभ्यास हुआ 2 सितम्बर 1946 को मुम्बई के मुस्लिम क्षेत्रों में, जिसमें दो सौ से  अधिक हिन्दू मारे गए तथा हजारों घायल हुए। यह उपद्रव भी कई दिन तक चले।
  • 1946 की ईद (29 अगस्त) से बंगाल के ही नोआखाली व टिप्पड़ा जिलों के हिन्दुओं का दुर्भाग्य शुरु हुआ और यह अक्तूबर के अन्त तक चलता रहा। दूर-दराज़ के क्षेत्र और आवागमन के साधन बहुत कम होने के कारण आरम्भिक कुछ दिन तक तो वहाँ के बारे में किसी को पता ही नहीं लगा। कलकत्ता में 14 अक्तूबर को पहली बार वहाँ की जानकारी पहुँची। लगभग प्रत्येक हिन्दू का घर जला दिया गया था या नष्ट कर दिया गया था। मन्दिरों की मूर्तियाँ तोड़ कर फेंक दी गई थीं। हिन्दू महिलाओं का अपहरण और उनके साथ जबरदस्ती ‘निकाह’ किया गया। भयंकर नरसंहार व बलपूर्वक धर्मान्तरण किया गया।
  • बिहार में 16 अगस्त से ही छुट-पुट घटनाएँ तो शुरु हो गई थीं, किन्तु व्यापक उपद्रवों की योजना नवम्बर में थी। किन्तु इस योजना में गड़बड़ हो गई। नोआखली व टिप्पड़ा में हुए अत्याचारों के विरोध में बिहार में 25 नवम्बर को अनेक स्थानों पर हिन्दुओं ने सभाएँ की। कुछ स्थानों पर मुसलमान अपने को नहीं रोक सके और इन विरोध-समाओं में उन्होंने गड़बड़ करने की कोशिश की। हिन्दू समझ गए कि मुसलमान यहाँ भी बंगाल की घटनाएँ दोहराने वाले हैं। अतः पहल मुसलमानों के हाथ में देना मूर्खता होगी और अपना सर्वनाश होगा। इस सोच ने हिन्दुओं को आक्रामक बना दिया और मुसलमानों को मुँह की खानी पड़ी। बिहार में 5,334 मुसलमान तथा 224 हिन्दू मारे गए।
  • दिसम्बर 1946 से जनवरी 1947 के द्वितीय सप्ताह तक सीमाप्रान्त के हजारा जिले में मुस्लिम कहर बरपा। प्रसिद्ध वाह कैम्प इसी जिले के शरणार्थियों के लिये बनाया गया था।
  • अभी तक तो यह ‘सीधी कार्रवाई’ के अलग-अलग स्थानों पर ‘अभ्यास’ ही थे। किन्तु 5 मार्च 1947 को एक साथ-पंजाब के कई जिलों—अमृतसर, लाहौर झेलम, सरगोधा, मुलतान, जालन्धर, कैमलपुर, रावलपिण्डी आदि—में बड़े-बड़े मुस्लिम जत्थों ने हिन्दुओं पर आक्रमण कर दिए। ये सभी जत्थे सशस्त्र थे। एक सप्ताह तक यह चला।
  • सर्वाधिक विनाश रावलपिण्डी जिले में हुआ। इस जिले के प्रत्येक गाँव में जहाँ-जहाँ हिन्दू थे, उन पर आक्रमण किये गए।
  • मार्च 1947 में दंगे उन जिलों में किये गए, जहाँ मुस्लिम जनसंख्या पर्याप्त थी। यह प्रथम पारी थी। द्वितीय पारी अप्रैल मास में उन जिलों में शुरु की गई, जहाँ अपेक्षाकृत कुछ कम मुस्लिम जनसंख्या थी—यानी गुजरानवाला, सियालकोट, गुजरात, गुड़गाँव आदि।
  • ये सभी आक्रमण सुनियोजित थे। मुस्लिम जनता, मुस्लिम पुलिस और मुस्लिम अधिकारियों में पूरी तरह सामंजस्र था। परिणाम स्वरूप दर्जन भर जिलों में व्यापक विनाश के साथ-साथ हजारों की संख्या में हिन्दू व सिख मारे गए तथा दस लाख लोग विस्थापित कर दिये गए।
  • लाहौर और अमृतसर में तो 5 मार्च को शुरु हुए ये दंगे अगस्त मास तक (छः महीने) चलते रहे। इन छः महीनों में अमृतसर शहर लगभग कर्फ्यू में ही रहा। लाहौर में भी कभी भी कर्फ्यू लग जाता था।
  • पाकिस्तान से आ रहे लुटे-पिटे व घायल हिन्दुओं की दुर्दशा को देख कर पूर्वी पंजाब के हिन्दुओं में भी प्रति क्रिया हुई और 15 अगस्त के बाद इधर से भी मुसलमानों का निष्कासन शुरु हुआ। 
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