आम्रपाली के 15 हजार घर खरीदार डेटा फिडिंग से क्यों बच रहे है???

Spread the love

आमप्राली के बायर्स मामले में एक बड़ा खुलासा। कस्टमर डाटा भरने से बच रहे है घर खरीदार। 15 हजार से ज्यादा घर खरीदारों नें कस्टमर डाटा फिड नही किया है जिसके कारण उनके हाथ से निकल सकते है उनके घर। 6 महीने पहले कोर्ट रिसीवर के द्वारा सभी ग्राहकों को वेवसाईट पर डाटा भरने के लिए कहा गया था लेकिन प्राप्त जानकारी के मुताबिक लगभग 15 हजार से ज्यादा घर खरीदार डाटा शेयर करने से बच रहे है या फिर उनके पास पुख्ता सबूत ही नही है। संभवत: ब्लैकमनी का मामला भी सामने आने की उम्मीद है। यह भी बात सामने आया है कि इनमें से कई नामी गरामी हस्ति भी शामिल है जिसने अभी तक डेटा शेयर नही किया है। कुल मिलाकर 40 हजार घर खरीदार है जिनको आम्रपाली में या तो घर मिल चुका है या इंतजार है।

नोएडा शहर के वरिष्ठ नागरिक व अधिवक्ता श्री अनिल के गर्ग (RISE) नें कहा है कि संभव है कि बेनामी घर खरीदारों के द्वारा ट्रांसजेक्शन कराया गया हो। या फिर घर ब्लैक मनी से खरीद फरोख्त किया गया हो। क्योंकि नोट बाद से लगातार सुप्रिम कोर्ट की निगरानी और 2017 में रेरा बनाया गया है तो इन लोगों यह बताने दिक्कत का सामना करना पड़ रहा हो कि पैसे कहाँ से लाये थे उसका सोर्स क्या है।

उन्होंने कहा है कि बेनामी घर खरीदारों के जो डाटा फिड करने में रूची नही ले रहे है उनका घर कैंसिल कर देना चाहिए। इसकों दुबारा से 25% राशी लेकर बुक करना चाहिए। इसके लिए माननीय न्यायालय से अनुमति लेना चाहिए। इसके साथ ही कोर्ट रिसिवर को ब्लैकमनी का जांच भी करानी चाहिए औऱ मामले को इन्कम टैक्स डिपार्टमेंट को सौप देना चाहिए। अगर 25 % लेकर इन बेनामी फ्लैटों को बेचा जाता है तो प्राधिकरण के पैसे भी निकल आयेंगे।

लेकिन उन से पहले यह भी देखना जरूरी है कि घर खरीदार जो डेटा नही फिड कर रहे है उसमें कोई भोले भाले तो नही है जिसकों बिल्डर और प्रमोटर्स के द्वारा बहला फुसलाकर पैसे ले लिया गया है किसी दूसरे एकाउण्ट में। शहर के मशहूर समाचार पत्र में छपे खबर के मुताबिक बिल्डर के द्वारा बहुत सारे फ्लैट को वेंडर के हाथों बेचा गया है। जिसमें सिमेंट और सरिया वाले प्रमुख है जाहिर है कि बकाया पैसे के बदले यह दिया गया होगा। ऐसे वेंडर के द्वारा किये गये लेन-देन का भी जांच होनी चाहिए।

सवाल उठता है आखिर आपूर्तिकर्ताओं को कानूनी तरीके फ्लैट क्यों नही दिये गए। क्या काला धन को सफेद करने की कोशिश की गयी है। लगभग 1500 करोड़ का मामला है जिसे फारेंसिक आडिट में भी उल्लेख किया गया है।

23.07.2019 को जजमेंट पास करते हुए रिट पिटीशन (सिविल) नंबर 940 में 2017, BIKRAM CHATTERJI और अन्य वर्सस यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य, टिप्पणियों का माननीय न्यायालय द्वारा निष्कर्ष निकाला गया था और फर्जी पर्चों / गैर-वास्तविक खरीद के संबंध में कुछ दिशा-निर्देश जारी किए गए थे जैसा कि उल्लेख किया गया था: 1. “दफ्तर के लड़कों और चपरासियों के नाम पर कई डमी कंपनियां बनाई गईं। तकनीकी रूप से, प्रारंभिक स्तर पर आवंटन शून्य-इनिटियो थे। इन कंपनियों के पास मुख्य वस्तु के अनुसार कोई सामग्री लेनदेन नहीं था, जिसके लिए उन्हें शामिल किया गया था। और एक भी व्यवसाय नहीं था “। आपूर्तिकर्ताओं से गैर-वास्तविक खरीद, लगभग 842.42 करोड़ रुपए की गैर-वास्तविक / फर्जी खरीद। ख। बिना किसी समायोजन के विभिन्न आपूर्तिकर्ताओं, फर्जी खरीद और अग्रिमों के लिए धन का मोड़ था। सी। फ्लैटों की बिक्री के संबंध में अंडर-वैल्यूएशन लेनदेन की बुकिंग के माध्यम से धन की निकासी भी हुई थी। 2. फॉरेंसिक ऑडिटर्स के पास घर-खरीदारों से नकद प्राप्त करने के निशान भी हैं, जिसका हिसाब किताबों में नहीं है। होम-बायर्स फंड्स को अन्य कंपनियों को 5,619.47 करोड़ रुपये की आय के माध्यम से डाइवर्ट किया गया था (i) 100.53 करोड़ रुपये के लिए निदेशकों को पेशेवर शुल्क का भुगतान (रुपये) रुपये 8,5.42 करोड़ के लिए फर्जी बिलिंग; (iii) ३२१.२१ करोड़ रुपए की कीमत के फ्लैटों का मूल्य-निर्धारण; (iv) फ्लैट्स के खिलाफ दलाली का भुगतान किया गया था जो कंपनी द्वारा नहीं बेचे गए थे, और (v) अंतर-कॉर्पोरेट जमा संबंधित संस्थाओं को दिए गए थे।

%d bloggers like this: