इस भीड़ से डरकर कहां गया कोरोना? भाभियों ने फाड़ डाले देवर के कपड़े और मारे कोड़े

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मथुरा के दाऊजी मंदिर में अनोखी होली खेली जाती है जिसे हुरंगा कहते हैं. कोरोना काल में भी मंगलवार को इस अनोखी होली को परंपरागत तरीके से मनाया गया. भाभियों ने फाड़ डाले देवर के कपड़े और मारे कोड़े.

एक तो कोरोना का बढ़ता कहर और दूसरी तरफ होली जैसा त्योहार, कोविड-19 के बढ़ते मामलों के बीच श्रीकृष्ण की नगरी मथुरा (Mathura) में होली (Holi) का त्योहार भी धूमधाम से मनाया गया. इस दौरान लोगों की भीड़ ऐसी दिखी कि लगा कोरोना भी डरकर भाग गया हो. मथुरा में होली राधा कृष्ण के प्रेम पर्व के रूप में मनाया जाता है.

इस भीड़ से डरकर कहां गया कोरोना? भाभियों ने फाड़ डाले देवर के कपड़े और मारे कोड़े

होली के अवसर पर मथुरा के बालदेव इलाके में स्थित मंदिर के प्रांगण में मंगलवार को करीब 5000 साल पुरानी परंपरा हुरंगा होली (Kapda Fad Holi) का आयोजन किया गया. इसमें पूरा मंदिर परिसर रंगीन तालाब के रूप में नजर आया. इस दौरान स्थानीय महि‍लाओं, जिन्हें हुरियारिन कहा जाता है, उन्होंने अपने देवरों, जिन्हें हुरियारे कहते हैं उनके कपड़े फाड़े और उनपर जमकर कोड़े बरसाए. इस तरह की अनोखी होली यहीं देखने को मिलती है. इस उत्सव में हर कोई राधे-कृष्‍ण और बलदाऊ के जयकारे लगाता नजर आया.

120 किलो गुलाब-गेंदा के फूल मंगवाए गए

विश्व प्रसिद्ध इस हुरंगे को भव्य बनाने के लिए 28 क्विंटल टेसू के फूल, 150 बोरा अबीर-गुलाल, 10 बोरा भुडभुड, 120 किलो गुलाब गेंदा के फूल मंगवाए गए थे. टेसू के फूलों से तैयार रंगों को मंदिर प्रांगण में हौदों में भरा गया. इस दौरान ब्रज के राजा बलदाऊ को ताम्र पत्र लगी भांग का भोग भी लगाया गया. यहीं पर लोगों के बीच भांग को प्रसाद के रूप में बांटा गया. मंदिर प्रांगण में भगवान श्रीकृष्ण और बलदेव के प्रतीकात्मक झंडों को लेकर गोस्वामी समाज के लोगों ने प्रवेश किया.

इस तरह से खेली जाती है होली

इस दौरान परिक्रमा हुई और महिलाओं और पुरुषों में झंडा को लेने का कम्पटीशन शुरू हो गया. इस उत्सव में हुरियारे पुरुष अपनी भाभी हुरियारिनों पर कुंड और हौजों में भरे रंग डालते जाते हैं और बदले में भाभियां उनके शरीर के वस्त्रों को पकड़कर खींच लेती हैं. वहीं कोड़ों को सहने की पुरुषों में होड़ मच गई. हर कोई इस मार को झेलना चाहता था. कोड़ों की तड़तड़ाहट से मंदि‍र प्रांगण गूंज उठा
5 हजार साल से चली आ रही हुरंगे की पुरानी परंपरा
इस अद्भुत उत्सव को देखने के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा. इस होली को देखने के लिए देश- विदेश से लोग यहां पहुंचते हैं. मंदिर के रिसीवर राम कठोर पांडेय ने बताया कि इस इलाके में होली के बाद हुरंगा की शुरुआत 5 हजार साल पहले हुई थी. उन्होंने बताया कि यह होली कृष्ण ने अपने सखाओं के साथ अपनी भाभी दाऊजी की घरवाली से खेली थी. इसी लिए यह देवर- भाभी की होली होती है.

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