जब जानवर कोई इंसान को मारे, कहते है दुनिया में बहशी उसे सारे

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आज कुते शव को नोच रहा है, भाईजान को बहुत चिंता हो रही है। लेकिन भाई जान उस समय में कहाँ होते हो जब इंसान कुते क नोच रहा होता है। अपनी पेट भरने के लिए, जीभ के स्वाद के लिए लाखों पशुओं की कुर्बानी कर दी जाती है, बलि चढ़ा दी जाती है। मानवता उस समय में शर्मशार होता है, जब दरिंदे इंसान दरिंदगी करता है। टेबल पर बैठे मुर्गा के टांग चबाते हुए ये कहना कि मानवता शर्मशार हो रहा है तो बिल्कुल सही है। बच्चे को यह कहना कि हत्या पाप है, उस मुर्गे का साथ क्या हुआ होगा जिसके टांग को तुम नोच रहे हो।

जैसी दरिंदगी बंगाल में हुआ या फिर हाथरस में। देश में हर रोज होने वाले दरिंदगी पर तो मानवता शर्मशार नही होता है लेकिन गंगा नदी में लाश क्या देख लिया मानवता शर्मशार होने लगा। मानवता उस समय भी तो शर्मशार होता है जब एक दरिंदगी के शिकार महिला या बच्ची से तरह तरह के सवाल किये जाते है। मानवता उस समय भी शर्मशार होते है जब बीबी सास बन जाती है और बेटी बीबी, बेटा साला और अपनी ही बेटी साली।

अरे भाई जान वो तो लाश है आज के समय में जिसे अपने भी हाथ नही लगाना चाहता है उसके साथ कैसी दरिंदगी, दरिंदगी वो होता है जो जिते जी एक मानव को लाश बना दिया जाता है और खामोश समाज के जिम्मेदारी नेता गिद्द की तरह उसे नोच नोचकर राजनीति करते है। मिडिया उसे लाश को जाति में बांटकर अपनी टीआर पी बढ़ाती है। दिल्ली के बार्डर पर एक गरीब बेटी के साथ दरिंदगी पर चुप रहने वाले मिडिया को बक्सर में गंगा में लाश दिखने लगे तो समझो , यह मानवता को शर्मशार करने वाली कृत्य है।

बार-बार मनुस्मृतियों का हवाला देकर मानवता का संदेश देने वालों क्या तुमने कभी मनुस्मृति पढ़ा है। मरे मुर्दे पर मानवता दिखाने वाला थोड़ा बंगाल चले जाओं। शर्म करो थोड़ा शर्म करो। आज कह रहे हो कुते लाश नोच रहा है। अज्ञानी लोगो पूरा सिस्टम को बिगाड़ने में लगे है।

जिल्ले इलाही तेरे जनाजे में भीड़ ऐसे उमड़ा जैसे कि मरने वाले लोगों को जिंदगी बांट रहे हो।

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