वतन की आवाज: योगी जी बताई न दुकान कब खुली, रेहड़ी पटरी व ठेला रिक्शा

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एक तरफ कोरोना की लहर नें बेवस किया है लोग घर से बाहर न निकले, दूसरी तरफ भूख की बेवसी है। सरकार की अपनी मजबूरी है राजस्व जमा करना है और कोरोना से निपटना है आम जनता की अपनी वेवसी है कैसे परिवार के भूख मिटाये और उसे कोरोना और भूख दोनों से बचाये।

कहने को भले ही बंद है लेकिन चोरी छुपी सारे दुकान तो सेटर गिराकर खुल ही रही है, आफत तो उनके लिए है जिनका कोई दुकान ही नही है। शाम को गलियों में दुकान लगते है और बड़ी भीड़ हो जाते है। इसमें भी सभी लोग नही लगा पाते है। इससे तो अच्छा है कि जिसकी जो जगह है वही पर दुकान लगे।

श- से शराब और स से सब्जी, पहले श से दूसरा स चलता है, मतलब पहले (श) शराब से सरकार चलती है, लेकिन दूसरे (स) से परिवार चलते है। अब आप ही बताईये न योगी जी सरकार बचाना आवश्यक है या परिवार । ऐसा नही है कि दूसरे (स) सब्जी से सरकार नही चल सकते है। आखिर पहले श में भी तो दूसरे स का 30% योगदान होता ही है। रेहड़ी पटरी संचालक एसोसिएशन, नेशनल हाकर्स फेडरेशन , पूर्वांचल पटरी दुकानदार कल्याण समिति ने पत्र लिखकर आपसे अनुरोध किया है आप उन पर ध्यान दीजिये।

इसलिए आवश्यक है कि शहर के लाईफ लाईन कहे जाने वाले रेहड़ी, पटरी और सब्जी के मार्केट भी निर्धारित समय के अनुसार लगे। आखिर सब एक दुसरे से जुड़े है। आत्मनिर्भर भारत के महत्वपूर्ण हिस्सा रेहड़ी पटरी, रिक्सा ठेला आपसे सहायता नही अपने रोजगार करने की अनुमति मांग रहा है। पिछले एक साल से बेचारगी में जी रहे इन वर्गों को राहत दीजिए और बताईये की दुकान कब खुली।

इन लोगों के समस्या को समझिये जो लोग इस शहर में अपने घर में रहते है उनक लिए भी परेशानी है लेकिन जो लोग किराये की धर मे रह रहे है मकान मालिक को 30 तारीख को किराया देना है साथ में 9 रुपये प्रति युनिट के हिसाब से बिजली भी चुकाना है अन्यथा आप जानते ही प्रदेशियों के साथ क्या होता है । प्राधिकरण ने जिन लोगों को दुकान आवंटन किया हुआ है उनको भी किस्त देना ही है। ऊपर से लोगों नें लोन लिया हुआ है उसको भी चुकाना है, स्कूल में बच्चे पढ रहे होंगे, स्कूल फिस भी देना है बिना किसी देरी किये, अन्यथा बच्चे स्कूल से बाहर ।

स्वास्थ्य मंत्रालय बता रही है प्रोटीन और ब्लैक चाकलेट लेना चाहिए, इससे कोविड के समय में टेंशन और डिप्रेशन से बचा जा सकता है। अब कितने पैसे कि आते है यह तो नही पता लेकिन यह तो पता है ही कि पैसे कि आते है , पैसे तो जभी आयेंगे न जब दुकान खुलेंगे। डाक्टर बता रहे है नारियल पानी पीना चाहिए, लेकिन कैसे पिये यहाँ तो 40 कि नारियल पानी 100 की बिक रहे है। जिनके घर में दाल खाने की पैसे नही हो वह पूरे परिवार को नारियल पानी पिला सकता है क्या?

कोविड के खतरा बढते चले जा रहे है पूरे परिवार को इंजेक्शन लगवानी है, सरकारी हास्पिटल में जाते है कि फ्रि वाले मिल जाये , लेकिन जब तक नंबर आते है वेक्सीन खत्म और खिड़की बंद हो जाते है। प्राईवेट वाले घर से दूर किसी अस्पताल में लगा रहे है और मनमाने रेट वसूल रहे है। वसूले भी क्यों नही मौका है। अब वहाँ भी पैसे देने होंगे, अब यही सोच कम इम्युनिटी पावर कम होता जा रहा है कि इतना सबकुछ करे कैसे । कमाई तो शुन्य है लेकिन खर्चा पूरे रुपये।

दो शब्द उनके लिए भी जो बात बात पर सरकार और नेताओं को धमकी देते है और कहते है आना वोट लेने या हमने आपको वोट देकर एहसान किया था तो आप भी हम पर एहसान करो। उनको बता दूं कि आपके पास हमेशा विकल्प है और आप हमेशा विकल्प के हिसाब से ही वोटिंग करते है और अपने अधिकारों का प्रयोग करते है आप किसी नेता पर एहसान नही करते है। इसलिए बार बार निवेदन है कि इस आपदा के समय में सरकार को सरकार बचाने के लिए मजबूर न करे। आप सरकार का सहयोग करे। आप जिसे भी वोट देंगे वो आपके ईशारे पर चले ऐसा तो हो नही सकता है इसलिए थोड़ा थोड़ा अपने स्वाभिमान से समझौता भी करे। देशहित में राष्ट्रहित में। हम रहे ना रहे यह राष्ट्र रहना चाहिए।

सरकार से एक बार फिर से मेरा हाथ जोड़कर निवेदन है कि रेहड़ी पटरी ठेला, रिक्शा जैसे आत्मनिर्भर लोगों के लिए कुछ भी विकल्प अवश्य तलाशने और इनको इनका काम करने दे। लाॅक डाउन में भी बड़ी कंपनी तो चल ही रही है आखिर उनको भी तो ग्राहक चाहिए।

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