वतन की आवाज: कोरोना महामारी और अफरातफरी

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कोरोना एक बार फिर से सिर उठा रहा है। जिससे अखबार के मुख्य पृष्ठ भरा पड़ा है, टीवी के स्क्रीन पर चिख चिल्लाहट का दौर निरंतर ही चल रहा है। राजनीतिक पार्टियाँ यहाँ भी अपनी जमीन तलाशने में लगी है। प्रायोजित तरीके से टीआरपी का खेल चल रहा है और लोगों को लाश दिखाये जा रहे है। लोगों को डराया जा रहा है। विपक्ष आम जनता की सहायता करने के बजाय सरकारी कामों में बाधा डाल रहे है।

नेताओं के गुण्डागर्दी भी अब सामने आने लगे है। जहाँ अस्पतालों में जाकर डाक्टर और नर्सों को धमकाया जा रहा है उनके साथ गाली गलौच किया जा रहा है। सुरक्षा में खड़े पुलिसवालों के साथ गाली गलौच करना कोई नयी बात नही है।

कुल मिलाकर यहाँ डर का माहौल बनाया जा रहा है। शमशानों में शव ऐसे दिखाये जा रहे है जैसे कि आज से पहले लोग मरते ही नही थे। या मनुष्य की मृत्यू पहली बार हुआ हो। भारत में रोज 70 हजार बच्चे पैदा हो रहे है। जाहिर है कि मरने वाले भी उससे 2 प्रतिशत कम होंगें। अगर हम 70 हजार में 2 प्रतिशत कम करे तो 68 हजार 600 होते है। लगभग इतने मृत्यू हर रोज होते है। इसमें सिर्फ 1 प्रतिशत से भी कम की वृद्धि हुई है जबकि पूरी दुनिया में महामारी है।

चलिए कुछ ऐसे समझते है:

आज देश के ज्यादातर मोहल्ला क्लिनिक बंद है, जहाँ पर लंबी लंबी लाईने लगा करती थी। निश्चित तौर पर वे सभी बीमार होते थे इसलिए लाईन में लगते थे। कुछ तो ऐसे भी लोग होते है जो दवाई खाकर बीमार पड़ जाते है, लेकिन फ्रि की है तो और संस्था या सरकार दे रही है तो खायेंगे जरूर। क्योंकि यही तो मौलिक अधिकार है, चिकित्सा का अधिकार स्वास्थ्य का अधिकार। अब वो लंबी लाईन नदारद है।

पिछली साल कोरोना के लहर अपने चरम सीमा पर था। अस्पताल से जितने भी बाॅडी निकले सभी कोरोना से संक्रमित था ऐसा बताया जाता था। इसी बीच में एक घटना जो मेरे सामने आया हैरान करने वाला था।

एक टैक्सी ड्राइवर अपने गाड़ी को सड़क के किनारे लगाकर ठीक करने के लिए गाड़ी के नीचे घुसा हुआ था। इतने एक दूसरा कार आया और जोरदार टक्कर मार दिया। अन्दर घुसे ड्राइवर का दर्दनाक मौत हो गया। डेड बाडी राममनोहर लोहिया हास्पिटल पहुँचा पोस्टमार्टम के लिए। पता चला कि मृतक कोरोना पाजिटिव था। लेकिन यहाँ एक बात ध्यान रखने वाली है कि उसका मौत कोरोना से नही बल्कि एक्सीडेंट से हुआ था।

अब अस्पताल वाले उस मौत को कोरोना पाजिटिव में और कोरोना से हुए मृत्यु में डाल दिया। लेकिन घर वाले की मुस्तैदी काम आयी और साथ ही उस गाड़ी वाले का जिसने टक्कर मारी थी। फिर उसको एक्सीडेंट बनाया गया।

इस उदाहरण से आप क्या समझते है।

यहाँ समझना ये है कि कोरोना पाजिटिव होने का कतई ये मतलब नही है कि सारे मौत कोरोना से ही हो रहे है। इसलिए घबराईये नही, भागिये नही, अफवाहों से दूर रहिये।

सोशल मिडिया और मिडिया में लगातार आक्सीजन और अस्पताल की मांग इस बात पर निर्भर है कि बाजार में अफवाह कितनी है। भारत भेड़ों की देश है। इसे ऐसे समझते है:

नाम में ‘आक्सीजन’ रखा है

मशहूर उपान्यासकार विलियम शेक्सपीयर के हवाले से अक्सर कहा जाता है कि नाम में क्या रखा है। लेकिन जब कोरोना संकट के इस समय में देश भर के कई अस्पताल और संस्थानों में प्राणवायु आक्सीजन की किल्लत की खबर है। तब से शेयर बाजार में आक्सीजन नाम वाली कई कंपनियों के शेयरों में निवेशक टुट पड़े है।

वजह इतनी है कि नाम में ‘आक्सीजन’ है , और निवेशकों को लग रहा है कि आने वाले समय में खूब कमाई होने वाली है। निवेशक यह तक नही पूछ रहे है कि कंपनी का कारोबार क्या है ? कंपनी का आक्सीजन से कुछ लेना देना भी है या नही। सच भी यही है कि जिन कंपनी के शेयर पर निवेशक टुट पड़े है उनका आक्सीजन से कुछ भी लेना देना नही है।

बांबे आक्सीजन इंवेस्टमेंट लिमिटेड के शेयरों में सोमवार को इस कदर खरीद हुई की भवा देैनिक पांच फिसद की अपर सर्किट लिमिट छुकर 24,574.85 रूपये के भाव पर पहुँच गया। इससे पहले कंपनी का शेयर 10.000 रूपये था। यानि कि आक्सीजन की कमी कि खबर मिलते ही कंपनी की शेयर आसमान छू लिया। दैनिक जागरण अर्थजगत 20 अप्रैल 2021

आज लोग सर्दी जुकाम और बुखार जो कि 12 महीने की बीमारी है। लेकिन उसे भी लोग कोरोना समझकर अस्पताल के तरफ भाग रहे है। अगर धोखे से भी रिपोर्ट पाजिटिव निकले तो सारा जमीन और आसमान सिर पर उठा ले रहे है। सोशल मिडिया पर ऐसे शेयर किये जा रहे है जैसे जिंदगी बस कुछ पल की है, और कुछ ही पल में समाप्त होने वाली है, जबकि 99 प्रतिशत लोग स्वस्थ्य हो रहे है।

जबकि डा0 और विशेषज्ञ लगातार सलाह दे रहे है कि इतना पैन्देमिक होने की जरूरत नही है। आपको सिर्फ आक्सीजन का लेवल मेंटेन करना है। आप अपने घर में रहे। जब आपका आक्सीजन लेवल कम होने लगे तब जाकर आपको अस्पताल में आने की जरूरत है। लेकिन आज लोग ई-रिक्शा और मोटरसाईकिल पर आक्सीजन लेकर घुम रहे है। अस्पताल में सारे बेट फूल है। लोग सिफारिश करने में लगे है। नेता , अभिनेता, डीएम, पुलिस और डाक्टर को फोन करके बेड देने की मांग कर रहे है। अगर इन सबसे भी काम न बने तो सोशल मिडिया जिंदाबाद है।

ऐसे हालात में हमारे डाक्टर के सामने एक विचित्र समस्या आन पड़ी है। किसको बेड दे और किसको न दे। उनके साथ गाली गलौच किया जा रहा है। जिससे निश्चित तौर पर उनका मनोबल टुट रहा होगा। यह काम राजनीतिक पार्टियाँ अपने वोट बैंक में इजाफा के लिए कर रहे है। इतना दबाब है कि जिसको बाकई में जरूरत है और सिफारिशन नही है तो उनको न बेड मिल रहा है और नही आक्सीजन और सड़कों पर तड़प तड़प के जान दे रहे है।

लगातार विशेषज्ञ बता रहे है कि आप आक्सीजन लेवल को बढ़ाने और बनाए रखने के लिए योग प्राणायाम करे। भस्त्रीका , कपाल भाती और अनुलोम विलोम करे । आप आयुर्वेद का काढ़ा पिये जो अस्पताल में भी पिलाये जा रहे है। गिलोय का गोली लेकर इम्यूनिटी बढ़ायें। यह सब आप करेंगे तो आपको अस्पताल के तरफ भागने की जरूरत नही पड़ेगा।

फिर अगर आपको लगता है कि आपको बेड की जरूरत नही है तो आप उन जरूरतमंद लोगों के लिए बेड छोड़ दे। क्योंकि जिसकों जरूरत है उसको बेड नही मिल पा रहा है लोग सिफारिश करके बेड हथिया ले रहे है। जिसके कारण दिनों दिन मृत्यु दर बढते जा रहे है।

आप सरकार को कोसते है। सरकार कोई भी हो 135 करोड़ लोगों के लिए बेड तो नही बना सकती है। क्या आप अपने घर में अपने परिवार और बच्चों के लिए इतनी व्यवस्था बनाया हुआ है कि अगर चार बच्चों के पेट खराब हो जाये तो एक साथ जा सके। सरकार भी आपकी तरह ही है।

इसलिे घबराईये नही। टीवी और सोशल मिडिया पर चल रहे प्रायोजित अफवाहों से दूर रहिये। घर मे रहकर या बाहर है तो सरकार की गाईडलाइन्स का पालन कीजिये, लेकिन इतना भी नही कि आपका दम घुट जाये। इस समय में सेवा में लगे लोगों का हौसला बढ़ाईये । उनको गाली देने का नुकसान आप पर आप आपके समाज पर ही पड़ेगा। सार्वजनिक स्थल पर जाये तो मास्क जरूर लगाईये।

रमन झा एक स्वतंत्र पत्रकार एवं विश्लेषक

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