वेदवाणी

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🌿 ऊर्ध्व ऊ षु णो अध्वरस्य होतरग्ने तिष्ठ देवताता यजीयान्। त्वं हि विश्वमभ्यसि मन्म प्र वेधसश्चित्तिरसि मनीषाम्🌿
॥ ऋग्वेद ४-६-१॥

🌿 हे अग्नि ! समस्त संसार के शासक और ज्ञान के प्रदाता, आप हमारे स्नेह और अहिंसक यज्ञ के सर्वोच्च स्थान पर विराजमान है। आप ही अकेले ऐसे हैं, जो हमारे विचारों और इच्छाओं को भली-भांति जानते हैं। आप ज्ञानवानों के भी ज्ञान में वृद्धि करते हैं।🌿

🌿 O Agni ! The ruler of all the worlds and the provider of knowledge, You are seated in the highest place of our affection and non-violent Yajna. You are the only one who knows our thoughts and desires very well. You also enhance the wisdom of the wise.🌿
(Rig Veda 4-6-1)
🌿🙏🌿 सुप्रभात🌿🙏🌿

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