अर्बन नक्सल आंतक का नासूर है, इससे जल्द निपटना होगा।

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छतीसगढ़ में नक्सली हमले में 22 जवानों की हत्या। उन जवानों के बलिदान के बाद केन्द्रिय गृहमंत्री अमित शाह की ओर से यह जो घोषणा की गई है कि नक्सली के खिलाफ अब निर्णायक लड़ाई लड़ी जायेगी। लेेकिन सवाल ये उठता है कि नक्सली को लड़ने से पहले उनको भटके हुए नौजवान या क्रान्तिकारी कहने वालों के खिलाफ कारवाई करने की आवश्यकता है। क्योकि यही अर्बन नक्सल नासूर है या कहे तो जड़ है नक्सल की।

नक्सलियों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ी जाये यह समय की मांग है। इसके बावजूद लंबे समय से यह वादे किए जाते रहे है और हर बार हमारे जवान को जान से हाथ धोना पड़ता है। हमें पहले आंतक के नासूल लाल सलाम से लड़ना होगा। यह एक राजनीतिक या सामाजिक पार्टी नही है वरन यह देश को बर्बाद करने वाला एक ठेकेदार है। हमें इनको समूल नाश करना होगा।

ये अर्वन नक्सल उन नक्सली से ज्यादा खतरनाक है जो बंदूक उठाए फिर रहे है। उनके हथियार उनके धन का सोर्स क्या है। एक समय में बिहार इन नक्सलियों के कारण बर्बाद था। उसमें कोई विशेष जाति या वर्ग के लोग नही अपितु सभी लफंगे टाइप के लोग शामिल थे जिनकों मेहनत करके खाना पसंद नही था। बिहार के जनता से थोड़ी भूल हो गयी है कि फिर नीतिश की सरकार है अन्यता वो दिन दूर नही जब बिहार में फिर से नक्सल अपना सर उठायेगा।

शहरी नक्सली से जंगल में छुपे नक्सली को खुराक मिलता है। इसके हाथ ही यह ही देखना होगा कि नक्सली संगठन उगाही और लूट करने के साथ ही आधुनिक हथियार को प्राप्त करने में कामयाब कैसे हो जाते है। निश्चित ही नक्सलियों को स्थानीय और शहरी नक्सल का समर्थन प्राप्त हैऔर इनसे संरक्षण मिलता है। इसी के सहारे नक्सलियों नें अपने आपको जंगल माफिया बना दिया है। वन संपदा के दोहन करने वालों को भी इन नक्सलियों से अच्छी खासी सांठ-गांठ है।

नक्सलियों का नाश तब तक संभव नही है , जब तक उन्हें अपने लोग अथवा भटके हुए नौजवान माना जायेगा। शायद व्यर्थ धारणा के चलते ही नक्सलियों के साथ आड़-पाड़ की लड़ाई नही लड़ी जा सकती है। आखिर जब कश्मीर के आतंकी और पूर्वेोतर के नक्सली के खिलाफ सेना का प्रयोग किया जा सकता है तो इन खुंखार नक्सलियों के खिलाफ क्यों नही ? अक्सर नक्सली के साथ मुठभेड़ में बलिदान हुए सैनिकों के शव को लाने के लिए सेना के सोर्स का प्रयोग किए जाते है तो नक्सली के खिलाफ अभियान में सेना का प्रयोग क्यों नहीं किया जा रहा है। आखिर कब तब हमने जवानों के शव को लाने के लिए सेना के जवान भेजते रहेंगे।

देश अपने जवानों के अधिक बलिदान को सहन करने को अब तैयार नहीं है। नक्सली के प्रति किसी भी प्रकार के नम्रता नही दिखायी जानी चाहिए। लेकिन इससे पहले इसके लाइफ लाइन शहरी अर्बव नक्सली पर शिकंजा कसना होगा जो जवानों के बलिदान पर मिठाई बांटते हुए कई बार देखे जाते है। ऐसे लाल झंडा देश के लिए खतरे की निशानी है जहाँ भी रहेगा शांति और चैन नही रहने देगा।

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