पगड़ी संभाल जट्टा

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-राजेश बैरागी-
यह इसी वर्ष जनवरी-फरवरी के किसी दिवस की घटना है।मृत्यु भोज चल रहा था और लोगों में खुसर-पुसर भी। खुसर-पुसर इतनी धीमी भी नहीं थी कि कान देना पड़े।यार, रिश्तेदार, शुभचिंतक और सगे संबंधी अलग-अलग समूहों में अनुमान लगाने में जुटे थे कि पगड़ी किसे बंधेगी। मृतक साठ पैंसठ साल का था। कैंसर से उसे मृत्यु प्राप्त हुई थी। भरे-पूरे परिवार में एक बेटी और दो बेटे (सभी शादीशुदा) और पत्नी रह गए थे। पगड़ी पर बेटी का कोई दावा नहीं होता। बड़ा बेटा दशकों से वृक्क(गुर्दे) की बीमारी से पीड़ित,छोटा मस्त मौला।

संपत्ति और आमदनी की कमी नहीं परंतु बीमारी और शौक बड़ी चीज होते हैं। मृत्युपरांत तेरहवीं का कार्यक्रम दो चरणों में संपन्न होता है। पहले चरण में लोग मृतक की आत्मा की शांति के लिए अपने उदर को भरपूर शांत करते हैं, दूसरे चरण में गंभीरता की चादर ओढ़कर मृतक के परिवार के भविष्य की चिंता करते हुए परिवार के किसी सदस्य को पगड़ी पहनाते हैं। अमूमन यह दायित्व ज्येष्ठ पुत्र को दिया जाता है परंतु परिस्थितियां परंपराओं को पलटने की स्वीकृति प्रदान करती हैं। पगड़ी प्रक्रिया के लिए लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई।

बड़े पुत्र का परंपरागत दावा पुरजोर था परंतु समाज के कथित जिम्मेदार लोग उसकी बीमारी की गंभीरता को आगे रखकर छोटे पुत्र को पगड़ी बांधने के पक्षधर थे। छोटे पुत्र को पगड़ी बांध दी गई। हालांकि उससे परिवार के दायित्वों को निभाने का कोई संकल्प नहीं लिया गया।कोरोना की इस दूसरी कहर लहर में छोटा पगड़ी धारी पुत्र अपनी वृद्ध मां और बड़े भाई के परिवार को उनके हाल पर छोड़कर अपनी पत्नी व बच्चों के साथ अपनी ससुराल चला गया।(नेक दृष्टि हिंदी साप्ताहिक नौएडा)

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