2- होली पर निकाली गई परम्परागत हथौड़े की बारात

Spread the love

=====================================

प्रयागराज। प्रयागराज में होली से पहले की एक अनूठी परंपरा है, जिसमें चौक में हथौड़े की बारात निकाली जाती है। इस बारात में पहले हथौड़े की विधि-विधान से पूजा करने के बाद आरती की जाती है। हथौड़ को नजर ना लगे इसलिए काला टीका लगाया जाता है। बाराती सिर पर लाल पगड़ी बांधे लोग ढोल-ताशे -नगाड़े के साथ नाचते हुए सड़कों पर निकल पड़ते हैं। इस बारात के बाद प्रयागराज में होली की शुरुआत हो जाती है। प्रयागराज में इस हथौड़े बारात की परंपरा पिछले कई वर्षों से चली आ रही है। पहले यह हथौड़ा बारात प्रयागराज के जीरो रोड से निकाली जाती थी। बदलते वक्त के साथ हथौड़े बारात का स्वरूप बदल गया।

अब हथौड़ा बारात की जगह बदलकर चौक के केसरवानी स्कूल हो गई। तकरीबन 30 किलोग्राम वजनी और 3 फीट लंबे हथौड़ा को दूल्हे की तरह सजाया जाता है। हर बार बारात को एक थीम पर आयोजित किया जाता है। इस बार महिला सशक्तिकरण और कोरोना वायरस पर आधारित बारात रही। बारात निकलने से पहले हथौड़े से एक बड़े कद्दू को फोड़ा जाता है।इस बार कद्दू को कोरोना को रूप में रखा गया था जिसे फोड़कर कोरोना को समाप्त करने की दुआ मांगी गई। इसी तरह होलिका दहन की भी प्रयागराज में एक परम्परा है, जो महीयसी महादेवी वर्मा से जुड़ी हुई है।

इस परम्परा के अनुसार अशोक नगर स्थित महीयसी महादेवी वर्मा के आवास पर परंपरागत रूप से होलिका जलाई गई। महादेवी के परिजनों और साहित्यकारों ने उनकी स्मृतियों को जीवंत किया। इस अवसर पर महादेवी के पुत्रवत सहायक रहे रामजी पांडेय की पत्नी रानी पांडेय ने होलिका जलाई। आशीष पांडेय और ब्रजेश पांडेय के संयोजन में साहित्यकारों और रंगकर्मियों का राई-नोन से नजर उतारी गई। लोगों ने एक दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर पर्व की शुभकामनाएं दीं। इस अवसर पर हुई सांस्कृतिक संध्या में रचनाकारों ने महादेवी के गीतों की संगीतमय प्रस्तुति की।

नव गीतकार यश मालवीय ने वर दे वीणा वादिनी की प्रस्तुति की। डॉ. श्लेष गौतम ने हास्य कविताओं से गुदगुदाया। आरती मालवीय ने महादेवी के गीत सब आंखों के आंसू उजले.. की प्रस्तुति की। नरेंद्र खोसले ने संस्मरण प्रस्तुत किए। अध्यक्षता प्रो. हेरंब चतुर्वेदी ने की। वरिष्ठ रंगकर्मी अनिल रंजन भौमिक, लेखिका अनिता गोपेश, रविकिरन जैन, अंशु मालवीय मौजूद रहे। तमाम साहित्य प्रेमियों से यह परम्परा जुड़ी हुई है।

%d bloggers like this: