तीन कहानियां कोरोना की

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-राजेश बैरागी-
धर्मवीर भारती को ‘ठेले पर हिमालय’ दिखाई दिया था। पीलीभीत में रहने वाले कंचनलाल को अपनी 22 वर्षीय पुत्री सुमन की पार्थिव देह को ठेले पर रखकर शमशान घाट जाना पड़ा। सुमन लंबे समय से बीमार थी। उसकी मृत्यु की जानकारी होने पर पड़ौसियों ने अपने दरवाजे बंद कर लिये। क्या कोरोना से मौत इतनी भयावह है? ऐसा होता तो सिडकुल हरिद्वार स्थित भेल के सेवानिवृत्त अधिकारी के शव को एक दिन फ्रीजर में रखने वाला एंबुलेंस चालक उनके पुत्र से अस्सी हजार रुपए किराया नहीं मांगता। मौत का भय अनैतिक कार्य से बचाता है। मौत का भय अज्ञात ईश्वर के प्रति श्रद्धा उत्पन्न कर देता है। मौत के भय से मुक्ति के लिए कंजूस का हाथ खुद बा खुद दान करने के लिए मचल उठता है। परंतु आपदा को अवसर में बदलने की भावना से प्रेरित नरदैत्य दवा, बिस्तर, ऑक्सीजन, एंबुलेंस,कफन सब में मुनाफा ही देखते हैं।तो क्या मानवता का पूरी तरह ह्रास हो गया है? यदि ऐसा होता तो नोएडा के जिला अस्पताल में बिहार निवासी 45 वर्षीय राजेंद्र शर्मा का शव अभी भी अंतिम संस्कार की बाट जोह रहा होता।कल रविवार को राजेंद्र शर्मा की जिला अस्पताल में मौत हो गई थी।पुत्र विकास के पास उनके शव को वापस घर या शमशान घाट ले जाने के लिए भी पैसे नहीं थे।उसे इधर उधर भटकता देख एंबुलेंस संचालक कृष्णकांत ने उसकी पीड़ा पूछी। फिर कृष्णकांत ने न केवल उसके पिता के शव को शमशान घाट तक पहुंचाया बल्कि अंतिम संस्कार में भी मदद की। मौत की ऐसी केवल तीन कहानी नहीं हैं।कोरोना काल ऐसी अनेक कहानियों की रचना कर रहा है।इन कहानियों के केंद्र में मौत है और उससे पहले मर चुके जीवित लोगों की उपकथाएं भी हैं।(नेक दृष्टि हिंदी साप्ताहिक नौएडा)

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