तीन में ना तीस में

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-राजेश बैरागी-
रहने के लिहाज से नोएडा कैसा शहर है? मुझे कभी नोएडा ने इस दृष्टि से आकर्षित नहीं किया परंतु असंख्य लोगों की दृष्टि में आज भी नोएडा में बसने की चाह देखी जा सकती है। दिल्ली के दक्षिण-पूर्व द्वार पर हिंडन और यमुना नदियों के दोआबे में बसे नोएडा को केंद्रीय आवास एवं शहरी विकास मंत्रालय द्वारा देशभर में “रहने के लिए उचित शहरों” के कराये गये सर्वेक्षण में कोई स्थान नहीं मिला। यह सर्वेक्षण 111 शहरों में लगभग 32 लाख लोगों की राय पर आधारित है।

बीते कल जब केंद्रीय आवास एवं शहरी विकास मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने ईज ऑफ लिविंग इंडेक्स जारी किया तो उसमें गाजियाबाद 30वें और फरीदाबाद 40वें स्थान पर रहा परंतु नोएडा का कहीं अता-पता नहीं था। क्या नोएडा सहारनपुर से भी गया बीता है जो 22वें स्थान पर रहा। यह सर्वेक्षण कराने के लिए चार बिंदु निर्धारित किये गये थे- जीवन की गुणवत्ता, विकास की स्थिरता, नागरिकों की समझ व आर्थिक क्षमता। सर्वेक्षण दो स्तरों पर किया गया दस लाख से अधिक आबादी वाले शहर तथा दस लाख से कम आबादी वाले शहर।

बंगलूरू इनमें सर्वश्रेष्ठ रहा जबकि बिहार का मुजफ्फरपुर सबसे फिसड्डी। नोएडा एक विषम शहर है।1976 में स्थापित नवीन ओखला औद्योगिक विकास प्राधिकरण के द्वारा बसाए गए इस एकीकृत औद्योगिक शहर में आज भी नगर नियोजन की आधारभूत कमियां स्पष्ट दिखाई देती हैं। गांवों के बीच में बसे इस शहर में सैकड़ों गांवों की दशा आज भी खराब ही है। सड़कों पर स्थाई अतिक्रमण, आवासीय सेक्टरों का मुख्य मार्गों पर होना,खुले बदबूदार नाले और प्राधिकरण में व्याप्त भ्रष्टाचार शहर को रहने के लिहाज से कहीं का नहीं छोड़ते। फिर भी दिनों-दिन यहां रहने वालों की संख्या क्यों बढ़ रही है? राष्ट्रीय राजधानी का उपग्रह शहरवासी होना क्या कम बात है।(नेक दृष्टि हिंदी साप्ताहिक नौएडा)

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