हिंदू जितना बहादूर से उससे ज्यादा मुर्ख भी है

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तीन राज्यों में भाजपा को वोट न देकर हमने मोदी का अहंकार तोड़ दिया। ये हमने कोई पहली बार नहीं किया है, इसी तरह पहले भी हमने साथ न देकर बड़ों-बड़ों का अहंकार तोड़ा है..

बहुत पहले सिंध के हिन्दू राजा दाहिर का अहंकार तत्कालीन अफगानिस्तान और राजस्थान के हिन्दू राजाओं ने खत्म किया था। दाहिर ने सहायता के लिये पत्र लिखा, पर कोई भी नहीं आया। बहुत अहंकार था दाहिर को अपने पराक्रम का, मारा गया। अब ये अलग बात है कि उसके बाद सिंध में हिन्दुओं का निरंतर पतन ही होता रहा और आज अफगानिस्तान पूर्णतः इस्लामिक राष्ट्र है।

इसी तरह हमने मुहम्मद गोरी के आक्रमण के समय पृथ्वीराज चौहान का साथ न देकर उनके अहंकार को तोड़ा था। अब अलग बात है कि बाद में गोरी ने जयचंद को भी कुत्ते की मौत मारा।

मेवाड़ वालों को भी अपनी बहादुरी का बड़ा अहंकार था। जब खिलजी ने मेवाड़ घेर लिया तब पूरे राजपूताने से किसी ने भी साथ नहीं दिया, रावल रतन धोखे से मारे गये और पद्मावती को 16000 औरतों के साथ जौहर करना पड़ा। पद्मावती को भी अपनी सुंदरता पर बड़ा अहंकार था, तोड़ दिया।

राणा सांगा ने जब लोधी को कैद किया था, तब उनके अहंकार को तोड़ने के लिये डाकू बाबर को बुलाया गया। युद्ध में किसी ने राणा सांगा का साथ नहीं दिया,
उनका सेनापति तीस हजार सैनिकों के साथ मारा गया,
सांगा का अहंकार टूट गया। लेकिन लोधियों को भी मुगलों की गुलामी करनी पड़ी, मन्दिर तोड़े गए, स्त्रियां लूटी मुगलों ने..पर सांगा का अहंकार तो टूट ही गया न।

मराठे बड़े प्रतापी थे, मुगलों की वाट लगा दी थी उन्होंने। उनको भी बहुत अहंकार था। मुगल हार गये तो काफिरों को रोकने के लिए अफगानिस्तान से अब्दाली बुलाया गया, पानीपत के मैदान में सेनाएं सज गयीं।
अब्दाली की सेना को तो रसद मिलती रही पर मराठों को किसी ने भी रसद नहीं भेजी..अहंकार जो तोड़ना था मराठों का।
भूखे पेट मराठे लड़ते रहे, मरते रहे..हार गये।
महाराष्ट्र का कोई ऐसा घर नहीं जिसका कोई बेटा शहीद न हुआ हो, लेकिन अहंकार तो टूट गया न।

न जाने कितनी बार हमने समय पर साथ न देकर अपनों के अहंकार को तोड़ा है, तो हम मोदी को भी सत्ता से हटा कर रहेंगे। भले ही हमें इसके लिये गोरियों, मुगलों, अब्दालियों या फिर इटली, पाकिस्तान की मदद लेनी पड़े और देश को उनके हाथों गिरवी रखना पड़े..
हम मोदी का अहंकार तोड़ कर ही रहेंगे।

क्योंकि हमें विदेशियों, विधर्मियों, वाममार्गियों आदि की ग़ुलामी में ही जीने की आदत पड़ गई है।

बात इतनी भी बड़ी नहीं थी कि बात का बतंगड़ बनाया जाए, पर जब सामने धूर्त और मक्कार लोगों का समूह हो तो ऐसा ही होता है।
भारत ने जनवरी के प्रारम्भ में 3 कोरोना वैक्सीनों को मंजूरी दी थी। उस समय भारत में वैक्सीन का करीब 10-15 करोड़ डोज़ का स्टाक रहा होगा। निर्माण क्षमता 5.6 करोड़ प्रतिमाह और टीका लगाने की योजना 13 लाख प्रतिदिन यानी 4 करोड़ प्रतिमाह।वैक्सीन की शैल्फ लाइफ 6 माह।
साथ ही वैक्सीन को देश के कोने-कोने में पंहुचाने की चुनौती। मैडिकल स्टाफ को प्रशिक्षण की चुनौती।
सब ठीक-ठाक हो जाता परंतु सभी भारत विरोधियों ने इस टीकाकरण अभियान को विफल बनाने के लिए पूरी शक्ति से दुष्प्रचार और मिथ्या खबरें जनता में फैलाने शुरू कर दिए। वैक्सीन खराब है, इससे लोग मर जाते हैं, वैक्सीन कारगर नहीं है, पूरी तरह टैस्टिंग नहीं हुई है, भाजपा की वैक्सीन है, नपुंसक बनाती है; और न जाने क्या क्या।
नतीजा यह हुआ कि जो टीकाकरण फ़रवरी अंत तक 7.5 करोड़ होना चाहिए था वह मात्र 20% यानी 1.5 करोड़ ही हुआ।


टीकाकरण की सुस्त रफ्तार को देखकर यह लग रहा था कि पहले से बनी अतिरिक्त वैक्सीन एक्सपायर हो जाएगी और भारत जैसे देश में वैक्सीन प्रबंधन का जोखिम खड़ा होना मामूली बात है। ऊपर से शत्रुतापूर्ण विरोधी। सरकार ने आनन- फानन में तय किया कि जिन देशों को वैक्सीन की आवश्यकता है उन्हें वैक्सीन उपलब्ध कराई जाए। इससे भारत की छवि भी बनेगी और अतिरिक्त वैक्सीन व्यर्थ भी नहीं होगी। कुल 6.5 करोड़ डोज विदेश भेजी गईं जिसमें 1.05 करोड़ दान में, कुछ WHO के लिए, कुछ वैक्सीन बनाने वाली कम्पनी के अनुग्रह (क्योंकि Covishield विदेशी सहयोग से बनी है) और कुछ कीमत लेकर भी दी गईं।


एक शुभ प्रयोजन के साथ किये गए कार्य के मार्ग में अगर दुष्ट और दुर्जन आ जाएँ तो वह कार्य को बिगाड़ने की कुचेष्टा में लग जाते हैं। भारत का यह सत्कर्म विदेशी फार्मा कम्पनियों को तीर की तरह से लगा। जहाँ यह कम्पनियाँ सम्पूर्ण विश्व को वैक्सीन के बल पर बंधक बनाने का प्रयोजन कर रहीं थीं, छोटे देशों की सरकारों के वाणिज्यिक और सैन्य प्रतिष्ठानों को गिरवी रखवा रहीं थीं, भारत के इस कदम ने उनके लिए घोर व्यवधान पैदा कर दिया। नतीजा यह, कि जैसे ही भारत में कोरोना की दूसरी लहर मुखर हुई, सारी दुनिया की मीडिया और प्रोपेगंडा कम्पनियों को भारत सरकार की हर प्रकार से निन्दा करने का कार्य मिल गया।


सही है कि कोरोना लहर से करोड़ों लोगों का जीवन अस्तव्यस्त हो गया अस्पताल कम पड़ गए, आक्सीजन कम पड़ गई, अनेक लोगों की असामयिक मृत्यु हुई। परंतु एक सत्य यह भी है कि इसी विभीषिका के कारण जो लोग वैक्सीन का विरोध कर रहे थे, अपने समर्थकों को लगवाने नहीं दे रहे थे, गुप-चुप वैक्सीन लगवाने लगे। इसी का परिणाम है कि मार्च और अप्रैल में वैक्सीन लगवाने वाले 14 करोड़ हैं जबकि मूल योजना मात्र 5 करोड़ प्रतिमाह की थी।


कोरोना की तीसरी लहर कैसे, कहां से और किन लोगों की लापरवाही और निष्क्रियता से फैली यह विचार विमर्श का एक और विषय हो सकता है, परंतु एक बात तो निश्चित है कि देश विदेश के सकल घटनाक्रम का ब्योरा सरकार के समक्ष है। अभी सरकार स्थिति पर नियंत्रण पाने और लोगों को राहत देने के कार्य में व्यस्त है, इसीलिए इस सब पर किसी प्रकार की तत्काल प्रतिक्रिया नहीं आ रही है।

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