समय का पहिया लड़क रहा है बेशर्मी मंदी हो गयी, आयुर्वेद और एलोपेथ में कुश्ती, वेक्सीन पर संग्राम।

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कहते है न समय का पहिया हमेशा घुमता रहता है। आज किसी का और कल किसी और का। ऐसा ही समय का चक्र महाराष्ट्रा और देश के इतिहास में घुमा है। किसी समय सुबोध कुमार जायसवाल महाराष्ट्रा के डीजीपी हुआ करते थे और अनिल देशमुख महाराष्ट्रा के गृहमंत्री। उस समय अनिल देशमुख ने डीजीपी सुबोध कुमार हो बहुत परेशान किया था। लेकिन आज अनिल देशमुख 100 करोड़ उगाही के मामले में सीबीआई के हिरासत में है और सुबोध कुमार जायवाल उस सीबीआई के बाॅस।

बीजेपी के नपुंसक बनाने वाली वे्क्सीन से लेकर वेक्सीन की किल्लत तक

देश हमे कैसा कैसा दिन दिखा रहा है। कोरोना महामारी के समय में जितना स्तर राजनीतिक का गिरा है उससे कही ज्यादा स्तर मानवता और नैतिकता का गिर गया है। कभी टीवी पर बैठकर भारत सरकार के कोविशिल्ट और कोवेक्सीन को बीजेपी के वेक्सीन बताकर लोगों को गुमराह करने वाले आज वेक्सीन की किल्लत को लेकर कोर्ट में पहुँच गये है।

सपा के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंंत्री अखिलेश यादव में मिडिया को बुलाकर कर कहा था कि हम तो बीजेपी की वेक्सी नही लगवायेंगे। हम तो अपने सरकार में वेक्सीन बनायेंगे तब लगवायें। फिर कुछ दिन के बाद ही वेक्सीन लगवा लेते है और कहते है कि सबसे पहले वेक्सीन गरीब को लगना चाहिए।

याद होगा तो यह भी याद होगा कि कांग्रेस के नेता मिडिया में आकर कहा था कि मोदी वेक्सीन लगाकर लोगों को नपुंसक बनाने बना रहा है, जिसके बाद देश भर के मौलवी और मौलानाओं नें वेक्सीन लगाने से मना कर दिया और देश के करोड़ो वेक्सीन की बर्बादी हुई। कांग्रेस के ही एक नेता ने आकर कहाँ था कि इस वेक्सीन में तो ग्लुकोज मिला हुआ है। जिसके बाद मोदी सरकार को वेक्सीन मैत्री करके वेक्सी विदेश भेजना पड़ा।

यहाँ पर हमे यह भी समझना होगा कि आखिर वेक्सीन की किल्लत क्यों होने लगी है इतनी जल्दी? कल तक जो इसे पानी और ग्लुकोज बता रहा था आज उसे जल्दी को होने लगा है। ये सभी मिलकर देश और देश के अर्थ व्यवस्था को बर्बाद करना चाहते है। देश के 300 की वेक्सीन खरीदने के लिए इनके पास पैसे नही है लेकिन अमेरिका के 1500 वाली वेक्सीन चाहिए। जिसके लिए मोदी सरकार पर लगातार दबाब बनाये जा रहे है। क्या विदेशी कंपनियों में इन पार्टियों के कमीशन फिक्स कर दिये है। जैसा कि विज्ञापन देने पर 50 प्रतिशत के रिटर्न मांगे जा रहे है।

एक पार्टी और उसमें परिवार के लोग

टवीटर पर एक ट्रेण्ड चलाये जा रहे है जिसमें बीजेपी के लोनी विधायक नंदकुमार गुर्जर और उनके परिवार को लेकर उन हमला किया जा रहा है। यहाँ यह कहना ठीक होगा कि उनके परिवारिक राजनीतिक को लेकर बीजेपी पर हमला किया गया है। जिसमें बीजेपी में भी परिवारवाद बताया गया है। निश्चित तौर पर बीजेपी में भी परिवारवाद है,

गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह नोएडा से भाजपा विधायक हैं, हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री पीके धूमल के बेटे अनुराग ठाकुर भाजपा सांसद, यूपी के पूर्व सीएम और कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह भाजपा सांसद हैं। कल्याण सिंह के ही पोते संदीप सिंह योगी सरकार में मंत्री ,केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी के बेटे वरुण गांधी सुल्तानपुर से भाजपा सांसद हैं। पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा वित्त राज्य मंत्री हैं। राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बेटे दुष्यंत राजे झालावाड़ से भाजपा सांसद हैं। और भी होंगे।

लेेकिन यहाँ यह देखना होगा कि यह लोग पार्टी में परिवार के लोग है, निश्चित तौर पर अगर एक परिवार को लोग एक ही पार्टी लोगों को वोट देते है तो निश्चित तौर पर उसमें नेता भी बनेंगे। ये बात और है कि किसी ने अपने पहुंच का प्रयोग किया हो।

लेकिन देश में बीजेपी को छोड़कर ज्यादातार पार्टी किसी एक परिवार कार है। जैसे समाजवादी पार्टी मुलायम सिंह के परिवार का है, क्या मजाल है कि कोई और उस पार्टी मुख्यमंत्री के उम्मीदवार बन जाये या फिर पार्टी के अध्यक्ष बन जाये। ऐसे ही पिछले 20 सालों से कांग्रेस में है या यह कहे कि कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर परिवारवादी पार्टी रही है। एक समय जरूर आया था जब कांग्रेस गांधी परिवार के हाथ से निकलता जा रहा था लेकिन पुन: वापस लौट आया। 1885 में ब्रिटिश इंडिया के द्वारा स्थापित इस पार्टी पर 1929 से लेकर 2021 तक गांधी नेहरू परिवार कार कब्ज बरकरार है और एक ही परिवार के लोग बार-बार प्रधानमंत्री और अध्यक्ष बने है। अगर विदेशी मूल का मुद्दा नही उठता तो पी वी नरसिन्हा राव व डा. मनमोहन सिंह को भी प्रधानमंत्री बनने का मौका नही मिलता। 70 सालों में 49 साल तक देश पर सिर्फ एक परिवार का राज रहा है।

इसके अलावा बहुजन समाज पार्टी के मालिक बहन मायावती है, उस पार्टी में किसी और का कोई हैसियत नही कि अध्यक्ष पद के लिए दावेदारी पेश करे। बिहार में राष्ट्रीय जनता दल पर लालू परिवार का कब्जा है, महाराष्ट्रा मे शिवसेना एक परिवारिक पार्टी बन चुका है। यही हालत देश के तमाम राज्यों और पार्टियों की है।

ऐसे में यह कहना कि बीजेपी में परिवारवाद नही है यह अतिश्योक्ति होगा। लेकिन यह भी जरूर कहना होगा कि बीजेपी पर आज तक किसी परिवार का कब्जा नही रहा है। शायद बीजेपी पर भी परिवार का कब्जा होता लेकिन लगातार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वारा पार्टी की विश्लेषण ने आज तक परिवारिक पार्टी होने से बचा कर रखा है।

20 लाख की अस्पताल बिल के बाद भी जिंदगी ।

आयुर्वेद और एलोपैथ के बीच चल रहे नूरा कुश्ती ने एक नया सवाल खड़ा कर दिया। लोग 20 लाख के अस्पताल बिल भरने के बाद भी मरीज को नही बचा पा रहे है ऐसे में आयुर्वेद के सस्ती ईलाज पर सवाल खड़ा करना अपने आप से ही सवाल खड़ा किया है।

पहले हाइड्रोक्लोरोक्वीन के लिए दौड़ाया , प्लाज्मा पर आया। रेमडेसिविर के लिए लाईन में लगवाया। लोगों नें इस इंजेक्शन को खरीदने के लिए अपने घर तक बेच दिये और घंटो तक लाईन में लगे रहे। नही मिली तो ब्लैक में 50 हजार से लेकर 1.5 लाख तक के नकली इंजेक्शन खरीद लिये। लेकिन जान चली गयी और कितने डाक्टर की नौकरी भी। जबकि यह कोरोना के ईलाज के लिए कारगर ही नही था।

मै किसी भी डाक्टर पर सवाल नही खड़ा कर रहा हूँ मेरा सवाल सिर्फ जिसस के मेहरबानी बताने वाले आईएमए के अध्यक्ष से है। अगर कोरोना जिसस के कारण ठिक हो रहा है तो सवाल यह भी उठता है कि क्या कोरोना जिसस ने ही फैलाया था ? जब सबकुछ अल्लाह के मर्जी से है तो कोरोना में मृत्यू हुए करोड़ो लोगों का दोष भी जिसस के माथे ही आनी चाहिए ? आकिर जिसस भारत से नाराज क्यों था ? जिसके कारण करोड़ो लोगों की जान चली गयी है।

माना की भारत में किसी बात को लेकर नाराजगी रही होगी,क्योंकि यहाँ सिर्फ 1% ही जिसस को मानने वाले लोग है बांकि को कनवर्ट करने की भरपूर कोशिश की जा रही है। लेकिन अमेरिका में तो 95% लोग जिसस को ही मानने वाले रहते है तो आखिर अमेरिका से जिसस की नाराजगी की क्या कारण हो सकता है ? ईटली में ऐसा क्या हुआ जो जिसस नाराज हुए और लाखो लोगों का जान ले लिया ?

जब लाखों के एलोपैथी बेकार निकला तो 500 रुपये वाली बाबा के कोरोनील पर सवाल क्यों उठाया जा रहा है ? ऐसा तो नही बाबा नें मेडिकल लाॅबी को आईना दिखा दिया है। ऐसा तो नही कि बाबा के कोरोनिल सिप्ला के रेमडेसिविर से ज्यादा कारगर निकला है, और अब एलौपेथ वालों को लगा है कि एक झटके में बाबा नें 70 हजार करोड़ की बिजनस को मिट्टी में मिला दिया।

लेकिन अब पतंजलि वालों को आगे बढ़कर आईएमए को धन्यवाद जरुर देना चाहिए, मुफ्त में लोगो को पता चल गया कि बाबा के पुरिया में इतना दम है। बस एक बात और कहना चाहता हूँ। रिसर्च सेंटर को धर्मांतरण का सेंटर न बनाया जाय। अन्यथा राज खुल जायेगा।

एक बात और मेरे किसी दोस्त ने ट्वीट करके पूछा है कि ये वायरस चाईना के आयुर्वेदिक लैब से फैला था या ऐलोपैथिक लैब से। मैने बोला तुम खुद ही आईएमए वालों से पूछ लो। शायद यह बता दे कि बाबा रामदेव एलुबेरा टेस्ट कर रहे ते उससे ही कोरोना बना बन गया और फिर उसी को कोरोनिल बना दिया। ऐसा आईएमए वाले सरकार के प्रवक्ता नही है जो सरकार को बताये कि उसे एलोपेथिक चलानी है या आयुर्वेदिक।

सोशल मिडिया पर नकेल कसने से सोशलिस्ट

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