आम जन को कोरोना नही कोरोना इलाज मे आने वाली खर्च सताने लगी है।

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कोरोना महामारी के समय मे अब स्थिति बदलती जा रही है। लोग कोरोना से कम और इलाज के खर्चे से ज्यादा डरने लगे है। हाल ही मे नोएडा फोर्टिस अस्पताल के द्वारा एक डाक्टर के इलाज के लिए 14 लाख के बिल लोगों को परेशान करने लगे है। सामान्य जन को यह चिंता सताने लगी है कि 14 लाख की बिल कहाँ से आयेगा, जिसने पूरे जिंदगी मे जमा नही किया हो।

नोएडा 14 जुलाई 2020

कोरोना महामारी लगातार अपना पैर पसारती जा रही है। हालाँकि 50 प्रतिशत से अधिक रिकवरी रेट लोगों को आश्वस्त करने के लिए काफी है। कोरोना से जो सबसे ज्यादा खतरा है घर के बुजुर्ग और बच्चों को है। हालाँकि मौत का कारण कोरोना नही है मौत का कारण पहले से जकड़े हुए रोग बताये जा रहे है। उम्मीद है कि जल्द ही वैज्ञानिक इसके लिए टीका बनाने मे कामयाब होंगे। सरकार से उम्मीद जतायी जा रही है कि यह टीका सामान्य लोगों के पहुँच के दायरे में होंगी।

लेकिन जब से फोर्टिस अस्पताल मे एक डाक्टर के कोरोना इलाज करने पर 14 लाख की बिल पकड़ाया गया था। इससे आम जनता मे कोरोना से ज्यादा अस्पताल की खर्च को लेकर भय की स्थिति है। किसी भी अस्पताल मे जाने पर पहले उसका कोरोना टेस्ट किया जाना और उसके लिए 5 हजार जमा कराने की बात सामान्य वर्ग के लिए बेईमानी और कष्टदायक है। कोरोना टेस्ट के डर से लोग अपने बच्चे को अस्पताल नही ले जा रहे है। कोशिश करते है कि इधर उधर की दवाई से ही उसका इलाज हो जाये। जिसके लिए लोग मेडिकल स्टोर से मेडिसिन लेकर अपने बच्चों को देने मे लगे है।

अगर यही स्थिति रही तो एक तरफ जहाँ प्राईवेट अस्पताल को कमाने की जरिया मिल जायेगा। वही दूसरी तरफ आम और गरीब आदमी के लिए असहनीय स्थिति बनने मे समय नही लगेंगे। इसलिए चाहिए की सरकार फ्री मे 80 करोड़ लोगों को भोजन देने के बजाय कोरोना टेस्ट फ्री करे। चाहे सरकारी अस्पताल हो या प्राईवेट कोरोना टेस्ट बिल्कुल फ्रि होना चाहिए जिस प्रकार से पल्स पोलिया और कुष्ठ रोग को मिटाने मे सरकार कामयाब रही है।

माननीय उच्चतम न्यायालय के द्वारा किये गये टिप्पणी को भी सरकार को अमल मे लाना चाहिए। कोई भी व्यक्ति पैसे के कारण अस्पताल से वापस नही लौटना चाहिए। आज की यह माननीय न्यायालय की टिप्पणी पर सरकार को जल्द से जल्द एक्शन लेना चाहिए और आयुषमान भारत की तर्ज पर या फिर फ्री मे इलाज की व्यवस्था करना चाहिए। यह 80 करोड़ लोगों को दिये जाने वाले भोजन से ज्यादा सरल होगा।

यह तर्क इसलिए भी उचित है कि अगर किसी गरीब आदमी के घर मे कोई भी कोरोना की केस निकलता है। उसके घर मे 5 लोग है तो उसे 25 हजार चाहिए पहली बार कि जाँच कराने के लिए। फिर दूसरी बार और तीसरी बार। इस समय मे जिसके घर मे भोजन की व्यवस्था नही है , सरकार उसके लिए भोजन फ्रि मे देने जा रही है। लेकिन इलाज की ये पैसे कौन देगा । कहाँ से लायेंगे ये लोग लाख दो लाख रूपया। अगर किसी अस्पताल ने 14 लाख के बिल बना दिया तो ये लोग पूरी जिंदगी गुलामी करते रहेंगे तो भी पैसे नही दे पायेंगे।

अगर किसी ने लोन लिया हो बैंक से तो उसे बहुत अच्छे तरीके से यह बात पता होगा कि लोन को चुकाने के लिए कैसे और क्या क्या करना होता है। ऐसे मे आम जनता को चिंतित होना स्वभाविक है। प्रशासन से कारवाई की डर और अस्पताल जाओ तो मोटी रकम चाहिए। भोजन तो कही न कही से मिल ही जाते है।

एक तरफ जहाँ लगातार कोरोना की महामारी बढती जा रही है वही दूसरी तरफ प्राईवेट अस्पतालों को रेगुलेट नही किया जाना एक चिंता की विषय जरूर है। माननीय न्यायालय ने भी आज इस बात को साफ कर दिया है। हालाँकि अस्पताल के तरफ खड़े वकील ने इसका विरोध किया है। लेकिन अब फैसला सरकार के हाथ मे है कि जनता को किस प्रकार से बचाती है। प्राईवेट अस्पताल के लूट से जनता को कितनी छूट देती है।

राष्ट्रप्रेम हिन्दी समाचार के लिए रमन कुमार नोएडा

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