हिंडन की रफ्तार: अमृत धारा बनाम विषधारा , गंगे नमामि परियोजना

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हिंडन नदी जिसका इतिहास 5 हजार साल पूराना है। इसी नदी नें खांडव प्रस्थ को इन्द्रप्रस्थ बना दिया था। हिंडन का एक और भी नाम है जिसें हरनंदी के नाम से भी जाना जाता है। जिस हरनंदी में कभी अमृतधारा बहता था और उसी हरनंदी में जहर बहता जा रहा है। कई शहरों के मलमुत्र को ढोता हुए यह नदी अब स्वयं से ही बहुत कमजोर हो गयी है। जिसके धारा में कभी सिक्का दिखता था अब वह धारा बिल्कुल तारकोल के जैसा बना गया है। इसके पानी को अब पीना तो दूर इसे छुना भी लोगों के लिए परेशानी का सबब बन जाता है। एनजीटी नें तो इसे मृत नदी भी करार दे दिया है। क्योंकि नदी के जल में घुले हुए आक्सीजन का मात्रा शुन्य तक पहुँच गया है। इसके साथ ही नदी अपने में ढेर सारे रसायन समाहित किया हुआ है। ये रसायन कौन मिला रहा है ? ये जानेंगे लेकिन इससे पहले जानते है यह नदी कहाँ कहाँ से गुजरती है उन पाँच शहरों के नाम :

सहारनपुर से निकलकर मुजफ्फरनगर मेरठ , बागपत और गाजियाबाद से होती हुई यह नदी यमुना में मिल जाती है। काफी लोग इस नदी को जानते भी होंगे। खासकर दिल्ली के पास नोएडा और गाजियाबाद में रहने वाले का सामना हिंडन नदी से जरूर होता होगा। भले ही हिंडन की थमी रफ्तार उनको नदी होने का एहसास नही दिलाता होगा। लेकिन सच तो यही है कि यह भी एक नदी है जिसकी रफ्तार आज भी अपनी इतिहास बता रही है। बढते शहरीकरण और मानव जनसंख्या में जिस प्रकार से नदियों के बारे में चिंतन या चिंता होनी चाहिए वैसा कुछ नही हो रहा है इसके बजाय लोग नदी के किनारे बसे शहर आज नदी के गला घोट दिया है।

लगातार हो रहे खनन और अतिक्रमण पर सरकारें तो सिर्फ रिपोर्ट ही बनाती है और उसी से काम चला लेती है। लेकिन अगर इसी प्रकार से विकास कार्य चलता रहा था तीसरा विश्व युद्ध पानी पर होना सत्य ही लगता है। नदी के पेटी में अतिक्रमण करके बनायी जा रही बड़ी बड़ी इमारतों का क्या कहना। लेकिन इसमे रहने वालों को भी तो पानी की जरूरत होगी।

एनजीटी नें साल 2019 में हिंडन को मृत नदी घोषित कर दिया। रिपोर्ट में लिखा गया कि हिंडन के किनारे रहने वाले 40 फिसद लोगों में जलजनित बीमारी है और इनका शिकार हो रहे है। इसकी वजह है कि इस इलाके में शहरीकरण तेजी से बढ़ा है और औद्योंगिक प्रतिष्ठानों का अपशिष्ट इसमे बहाया जा रहा है।

हिमालय की तराई से निकलने वाली यह एक बरसाती नदी है जिसे एनजीटी नें एक त्रासदी कहकर पल्ला झाड़ लिया है। सेंटर फार साईंस एंड इन्वायरमेंट और जनहित फाउण्डेशन ने ‘हिण्डन रिवर ; गैपिंग फार ब्रिद ‘ नाम से उन 6 जिलों का एक अध्ययन किया था जहाँ से हिंडन गुजरती है। इस अध्ययन के मुताबिक न तो नदी सुरक्षित रही है न ही इसके किनारे रहने वाले लोग।

मोदी सरकार नें गंगा नमामि परियोजना के तहत 20 हजार करोड़ का बजट दिया है लेकिन अभी तक 12 हजार करोड़ ही खर्चा किया गया है। लेकिन वो खर्चा कहाँ किया गया है इसका भी कुछ पता ठिकाना नही है। हिंडन भी गंगे नमामि परियोजना के तहत है क्योंकि यह यमुना के सहायक नदियों में से एक है। ऐसा लगता है कि बजट खर्च सिर्फ अखबारों और टीवी पर ही किया जा रहा है। जमीनी हकीकत तो देखिया क्या है।

नोएडा कुलेसरा

बढते विकास के क्रम में हमें नदियों से अनभिज्ञ कर दिया है। सिर्फ गाजियाबाद में ही 8 बड़े नाले इस नदी में गिरते है या कहे कि शहर के अपशिष्ट को उडेला जा रहा है तो अतिश्योंक्ति नही होगा। ज्वाला, अर्थला, कैला भट्टा, इंदिरापुरम, डासना करहेड़ा, प्रताप विहार और हिंडन विहार ये सभी नाले भी हिंडन मे आकर प्रवाहित होते है। उस समय मे सरकारी टीम नें 23 उद्योगों का दौरा किया था जिसमें से सिर्फ होंडा को छोड़कर शायद ही कोई पर्यावरण मानकों का पालन करता मिला हो। जिन उद्योगो नें अपने परिसर में एसटीपी और ईटीपी लगा रखा है वे भी अपना अपशिष्ट सीधे-सीधे नदी मे प्रवाहित कर रहे है।

यह तय है कि हिंडन की थमती रफ्तार हम सभी के लिए प्राणघातक होगा। बरसात में उग्र नदी से मत डरिये, हमारी वजह से मरती हुए नदी भी वेवजह नुकसानदेह होगी। पेरिस जापान और स्वीटजरलैंड में बड़े बड़े भाषण दिये जाते है । लेकिन कोई आकर नोएडा के कुलेसर पुल के नीचे नही झांकते । समस्या यहा है तो भाषण स्वीजरलैंड में क्यों ?

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