शाह आलमी की आग, हजारों हिंदुओं की हत्या

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शाह आलमी की आग

मुस्लिम लीग द्वारा पाकिस्तान की मांग, 16 अगस्त, 1946 को सीधी कार्यवाही के नाम पर हजारों हिन्दुओं की हत्या और गांधी जी द्वारा मुस्लिम गुंडागर्दी के आगे झुक जाने से मुसलमानों की हिम्मत बढ़ती गयी। जहां उनकी संख्या अधिक थी, वहां उन्होंने खुलेआम हिंसा का तांडव शुरू कर दिया। इसका सामना किया, तो केवल संघ के स्वयंसेवकों ने। इनमें एक 18 वर्षीय युवक महेन्द्र भी था, जो हर संकट के समय सबसे पहले वहां पहुंच जाता था।

लाहौर में कई क्षेत्र ऐसे थे, जहां कम जनसंख्या के कारण हिन्दू अत्याचार सहने को बाध्य थे। किला मोहल्ले के मियां परिवार का एक सदस्य लाहौर का नगराध्यक्ष था। यहां मुस्लिम गुंडों के लिए 24 घंटे भोजनालय खुला रहता था। हिन्दू या सिख को मारने तथा उनकी सम्पत्ति को जलाने वालों को नकद पुरस्कार भी दिया जाता था। पुलिस के मुसलमान सिपाही इन गुंडों को प्रोत्साहित करते थे, जबकि हिन्दू और सिख अधिकारी भयवश वहां जाने से बचते थे।

लाहौर के इन गुंडों की नजर में शाह आलमी दरवाजा बहुत चुभता था,क्योंकि इससे ही पुराने शहर के हिन्दू आते-जाते थे। इस मोहल्ले में बाजार तंग था तथा लोहे के कई मजबूत दरवाजे लगे थे। संकट में इन दरवाजों पर युवक डट जाते थे, जिससे लीगी गुंडों को खाली हाथ वापस लौटना पड़ता था।

लाहौर के कुख्यात मुसलमान मजिस्ट्रेट चीमा ने एक दिन वहां से 150 हिन्दुओं को गिरफ्तार कर लिया। तलाशी के नाम पर लूटपाट की और मोहल्ले के सुरक्षा द्वार व उनके ताले तोड़ दिये। उसके साथ सब सिपाही भी मुसलमान ही थे। इसके बाद 20 जून, 1947 की रात में मुसलमानों ने एक मकान को आग लगा दी; पर जागरूक लोगों ने शीघ्र ही उसे बुझा दिया। सुबह होते ही चीमा ने 24 घंटे का कर्फ्यू लगा दिया। षड्यन्त्रपूर्वक पुलिस की गश्त बढ़ा दी गयी। जो भी बाहर निकला, उसे गोली मार दी गयी।

रात में एक बार फिर हजारों गुंडों की भीड़ हथियारों से लैस होकर शाह आलमी दरवाजे पर टूट पड़ी। उन्होंने पैट्रोल छिड़क कर कई दुकानों और मकानों में आग लगा दी। इस बाजार में कागज, तेल, कपड़े, घी आदि की कई दुकानें थीं। अतः आग ने शीघ्र ही भीषण रूप ले लिया। पुरुष और युवक तो आग बचाने में लग गये; पर इस बीच सैकड़ों महिलाएं व बच्चे आग में जलकर मारे गये।

संघ के स्वयंसेवक भी मोर्चे पर डटे ही थे। वे गलियों में स्थित कुओं से पानी लेकर आग बुझाने लगे। कुछ युवक पूरे मोहल्ले को आग से बचाने के लिए जलते भवनों को तोड़कर उन्हें बाकी से अलग करने लगे। अचानक महेन्द्र को ध्यान आया कि गांधी स्क्वायर में पानी निकालने का एक इंजन रहता है। वह जान पर खेलकर अपने कुछ साथियों के साथ बाहर निकला और मती चौक वाले दूसरे रास्ते से इंजन को लाकर पानी चालू कर दिया।

पर फिर भी आग दावानल की तरह बढ़ती ही रही। अतः निर्णय लिया गया कि तीन ओर से बारूद लगाकर जलती हुई दुकानों को उड़ा दिया जाए, जिससे शेष मोहल्ला बच सके। यह काम भी महेन्द्र ने अपने कंधे पर लिया। कई घंटे के प्रयास के बाद बारूद लगाया जा सका और फिर एक विस्फोट के साथ जलती हुई दुकानें ध्वस्त कर शेष मोहल्ले को बचा लिया गया।

पर इस अग्नियुद्ध में वह वीर बुरी तरह झुलस गया। बाहर का वातावरण इतना खराब था कि उसे किसी चिकित्सालय में भी ले जाना संभव नहीं था। तीन दिन तक अपार कष्ट सहकर हिन्दुओं का रक्षक और लाहौर के जन-जन का वह दुलारा स्वयंसेवक महेन्द्र 24 जून, 1947 को परमधाम को चला गया।

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