साहस और सफलता

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    कोलंबस अपने समय का एक प्रसिध्द नाविक था । उसमे साहस और आत्मविश्वास कूट-कूट कर भरा था । इसीलिए वह अपने कुछ साथियो के सात एक छोटा सा जहाज लेकर नई दुनिया की खोज करने के लिए निकल पड़ा । इस खोज यात्रा के दौरान एक दिन अचानक समुद्र मे भयानक तुफन आ गया ।
    तीन दिनो तक कोलंबस का जहाज समुद्री लहरो से टक्कर लेता रहा । इस कारण जहाज का एक मस्तुल खराब हो गया । उन दिनो जहाज इंजन मे नही चलते थे । ऊची बल्ली लगाकर पाल तान दिए जाते थे उस पाल मे हवा भर जाती थी जिससे जहाज चलते थे । मस्तुल के खराब होने का अर्थ था – जहाज और यात्रियो की जान को खतरा । जहाज किस और जाएगा , यह नाविक भी नही बता सकते थे । ऐसे मे कोलंबस के सब साथी घबरा गए । उन्होने कहा ,”अब हम आगे नही जाएंगे । “

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    कोलंबस के साथियो ने हार मान ली लेकिन कोलंबस बहुत साहसी था । उसने हार नही मानी और अपने साथियो से कहा, “ देखो , यह तुफान हमारी परिक्षा ले रहा है लेकिन चाहे जो भी हो जाए , हम हार नही मानेगे ।
    कोलंबस की प्रेरणा भरी बाते सुन कर उसके साथियो मे भी साहस का सचांर हुआ ।लेकिन वे अभी थोड़ा ही आगे बढे थे की दिशा बताने वाली उनकी घड़ी खराब हो गई घड़ी के खराब होने से यह पता चलना कठिन हो गया की वे किस दिशा मे आगे बढ रहे है । फिर भी जहाज मे नाविको का नेतूत्व कर रहे कोलंबल के चेहरे पर एक शिकन नही आई उसके साथियो ने कहा ,”मै कहता हुं की कितनी भी मुश्किले क्यो न आए जीत हमारी ही होगा । “
    अत: कोलंबस की बात ठिक निकली । वे अनेक परेशानियो का सामना करते हुए आगे बढते गए और उनहे नई दुनिया मील गई जिसकी तलाश मे वे निकले थे । इसलिए तो कहा गया है की जहा साहस होता है वही ,सफलता मिलती है ।