पालीथिन पर्यावरण के साथ ही गोवंश के लिए भी अभिशाप बन गई है

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मई 2018 में प्रदेश सरकार ने पालीथिन पर प्रतिबंध लगाया था। इसके बाद पुलिश व प्रशासन ने अभियान चलाकर पालीथिन को जब्त भी किया, लेकिन कुछ दिनों बाद ही अभियान ठडे पड़ गये दुकानों पर पालीथिन का इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा हैं।

पिछले कुछ दिन पहले जलपुरा गाँव की गोशाला में एक दर्जन से अधिक कोवंश की मौत का वीडियो वायरल हुआ। लेकिव राजनीतिक दल सामाजिक संगठनों के साथ गो प्रेमियों ने जमकर हंगामा किया। कई दिग्गज नेताओं ने ट्वीट कर नाराजगी जताई। मामलला तूल पकड़ता देख आलाधिकारियों ने चार लोगों पर कार्रवाई कर इतिश्री कर लीस लेकिन गोवंश बचाने की दिशा में कोई सार्थक पहल शुरू नहीं हो सकी है, होगी भी तो कैसे जब तक पालीथिन की फैक्टरी चलेगी तब तक गोवंश अशुरक्षित रहेगे शहर में हजारों गोवंश कूड़े के ढेर में अपना निवाला तलाश रहा है। उन्हें बचाने के दावे खोखले साबित हो रहे हें। इसे विडंबना ही कहेंगे कि देवताओंं को भी भोग और मोक्ष देने की शक्ति रखने वाला गोवंश आज चारे के अभाव में प्लास्टिक की थैलियों से पेट भरने को मजबूर है।

प्लास्टिक का कचरा पर्यावरण के साथ गोवंश के लिए अभिशाप बन गया है। जलपुरा गांव की गोशाला में 200 से अधिक गोवंश संरक्षित है। पशु चिकित्सकों की मानें, तो गोशाला लाई जाने वाली ज्यादातर गाय पालीथिन खाने से बीमार हैं। जांच में गोवंश के पेट में पालीथिन पाए जाने के मामले सामने आए हैं। बच्चों को डाइपर का इस्तेमाल करने के बाद यू ही फेंक देती है। डाइपर में जमा यूरीन उसमें जौदूद केमिकल की वजब से जैल में परिवर्तित हो जाता है। इसे बेसहारा पशु निगल जाते है।

लोग बचा हुआ खाना पालीथिन में बांधकर कूड़े में फेंक देते है। इसे गोवंश पालीथिन समेत निगल जाते हैं। धीरे-धीरे उनके पेट में प्लास्टिक जमा हो जाती है। इससे उनका पांचन तंत्र हिगड़ने लगता है और समय से पहले उनकी मृत्यु हो जाती है।

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