पसीने से पैदा हुए फूल

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    यह उस समय की बात है जब भगवान श्रीराम शबरी से मिले थे। शबरी की कुटिया के चारों ओर ढेरों फूल लगे हुए थे। वे फूल कभी मुरझाते नहीं थे, सूखते नहीं थे और उनसे सदैव मीठी-मीठी सुगंध आती रहती थी। एसे सुदंर फूल देखकर श्रीराम ने शबरी से पूछा, ये फूल किसने लगाए है?”
    शबरी बोली,” प्रभू इन फूलो का एक अलग इतिहास है।“
    श्रीराम ने उत्सुकता से पूछा,” कैसा इतिहास?
    शबरी बोली,” एक बार आश्रम मे लकरी ना होने के कारण मतंग ऋषि विचार में डूबे हुए थे। भोजन बनाने के लिए तुरंत लकड़ी की आवश्यकता थी। शिष्यों ने सुबह से कुछ भी नहीं खाया था। कुछ समय बाद मतंग ऋषि एकाएक खड़े हुए और कंधे पर कुल्हाड़ी रखकर निकल पड़े। गुरूदेव को जाते देखकर सारे शिष्य भी उनके साथ हो लिए। सभी लोग दूर जगंल में गए। उन्होंने सूखी लकड़िया काटीं, उनके गट्ठर बांधे और उन्हें सिर पर रखकर आश्रम में वापस लौट आए।“
    भगवान राम तल्लीनता से शबरी की बातें सुन रहे थे। शबरी आगे बोली, ग्रीष्म ऋतु के दिन थे। तेज धूप पड़ रही थी सभी के अंग-प्रत्यंग से पसीने की बूंदें टपक रही थीं। गुरू तथा शिष्य सभी थके हुए थे, अत: वे शीघ्र ही सो गए। प्रात: काल जब मतंग ऋषि और शिष्य सोकर उठे तो मंद-मंद वायु के झोकों के साथ मन को प्रसन्न करने वाली सुगंध आ रही थी। सब लोग आश्चर्य से पूछने लगे, यह सुगंध कहा से आ रही है? मतंग ऋषि ने कहा, लकड़ी लाते समय कल जहां-जहां हमारा पसीना गिरा था, वहां- वहां सुदंर फूल खिल गए हैं। यह सुगंध उन्ही फूलों से आ रही है।“
    शबरी कथा जारी रखते हुए बोली, हे प्रभू ! ये पसीने से उत्पन्न होने वाले फूल है। नि:स्वार्थ परिश्रम का फल मीठा और सुगंधयुक्त होता है।“
    तब श्रीराम बोले,” तुम ठीक कहती हो। इस जगत में कर्म ही सबसे बड़ा योग है और कर्म की पूजा ही सबसे बड़ी पूजा है। वह कर्म ही है जो सबसे सुदंर है। उसकी सुगंध चारो दिशाओं में फैल जाती है।