नीतीश कुमार ने लालू यादव को बनवाया नेता प्रतिपक्ष

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बिहार विधानसभा के प्रथम सत्र के अंतिम दिन राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव की निजी टिप्पणी पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी आवेश में आ गए और जमकर पलटवार किया। मुख्यमंत्री ने तेजस्वी को चार्जशीटेड बताते हुए कहा कि उनपर कार्रवाई होनी चाहिए। राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा में भाग लेते हुए नीतीश कुमार ने तेजस्वी यादव का बिना नाम लेते हुए कहा, ‘मेरे भाई समान दोस्त का बेटा है, इसलिए सुनता रहता हूं। हम कुछ नहीं बोलते हैं और यह कुछ भी बोलता है। उपमुख्यमंत्री हमने बनाया। तुम क्या जानोगे। इसके पिता को उस समय किसने बनवाया था, विधायक दल का नेता? इसे पता है।’

बिहार विधानसभा में शुक्रवार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव पर आग बबूला हो गए। इस दौरान नीतीश कुमार ने तेजस्वी यादव को याद दिलाया कि उन्होंने ने ही उनके पिता लालू प्रसाद यादव को विधायक दल का नेता बनवाया था। यूं तो नीतीश गुस्से में आकर यह लाइन बोल गए, लेकिन इसके साथ उन्होंने 1990 के दौर के राजनीति के पन्ने को खोल गए। नीतीश कुमार के इस बयान से नए जमाने के लोगों के जेहन में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर क्या था वो दौर जिसमें नीतीश कुमार ने लालू यादव को विधायक दल का नेता बनवाया था। आइए इसे विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं।

कर्पूरी ठाकुर की विरासत कौन संभालेगा

बात 17 फरवरी 1988 का। हार्ट फेल होने से महान नेता कर्पूरी ठाकुर का निधन हो गया था। उनकी शव यात्रा में गरीबों की उमड़ी भीड़ ना केवल बिहार बल्कि पूरा देश दंग था। कर्पूरी के यूं अचानक चले जाने से लोकदल के नेता शोक में थे। पार्टी के सभी बड़े नेता इसी माथापच्ची में लगे थे कि कर्पूरी की पार्टी में कौन लेगा। देवीलाल व बहुगुणा दोनों खेमों में कर्पूरी की विरासत संभालने को लेकर खींचतान तेज हो गई थी। इसी दौरान यादव समाज अपना नेतृत्व स्थापित करना चाहते थे। उस समय यादव समाज के करीब 18 विधायक थे। संख्या के मुताबिक विधानसभा में लगभग 45 विधायक लोकदल के थे। यानी स्पष्ट था कि लोकदल का चुना गया नेता ही प्रतिपक्ष का नेता होगा और विधानसभा चुनाव के बाद संख्या बल के आधार पर उसे ही मुख्यमंत्री पद मिलेगा।

देवीलाल की नजर में नहीं था कोई कद्दावर यादव नेता

बहुगुणा खेमे में कई बड़े कद्दावर यादव विधायक थे, जिनमें विनायक प्रसाद, गजेंद्र हिमांशु और अनूप लाल यादव शामिल थे। देवीलाल के पास कोई चर्चित यादव चेहरा नहीं था, जिसे इस बड़ी जिम्मेदारी के लिए चुना जा सके। लोकदल के गैर यादव पिछड़ी जाति के विधायकों में नीतीश कुमार काफी सक्रिय थे। चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में वे राष्ट्रीय स्तर पर युवा संगठन में पदाधिकारी रह चुके थे और कर्पूरी ठाकुर के साथ बिहार के पार्टी युवा संगठन के अध्यक्ष भी। शरद यादव, चौधरी देवीलाल के प्रतिनिधि के रूप में डेरा डाले हुए थे।

और जब नीतीश ने उछाल दिया लालू यादव का नाम

सर्वसम्मति से तय हुआ कि यादव समूह के विधायकों में जिसकी संख्या अधिक होगी, उसे ही जिम्मेदारी मिलेगी। पटना में मीटिंग की तिथि तय हो गई। नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद का नाम सुझाया, तो एक झटके में सभी आश्चर्यचकित थे। शुरू में शरद यादव को भी उनके नाम पर सहमति बनाने में परेशानी हुई। आखिरकार आधे से अधिक सजातीय विधायकों की गोलबंदी के बाद नीतीश कुमार के प्रयत्नों से यह संभव हुआ।

केंद्र में जाकर नीतीश ने लालू के लिए राह की आसान

हालांकि एक बड़ी परीक्षा से अभी गुजरना बाकी था। लोकसभा चुनाव के बाद वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने और देवीलाल उप प्रधानमंत्री। इस बीच बहुगुणा की हृदय चिकित्सा के दौरान मृत्यु हो गई। चंद्रशेखर इस बीच वीपी सिंह के विरुद्ध काफी मुखर हो चुके थे। समूची पार्टी में संदेह एवं अविश्वास का वातावरण था। इसी माहौल में 1990 में बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा हो गई। नीतीश कुमार ने केंद्र में राज्यमंत्री पद स्वीकार कर लालू प्रसाद के लिए पहले ही रास्ता साफ कर दिया था, लेकिन इसके बावजूद चुनाव के बाद जनता दल विधानमंडल के नेता पद को लेकर घमासान शुरू हो गया।

इस तरह पहली बार CM बने लालू प्रसाद यादव

जनता दल विधानसभा में 122 सीट जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरा। अब मुख्यमंत्री पद के लिए देवीलाल खेमे से लालू प्रसाद और वीपी सिंह खेमे से रामसुंदर दास आमने-सामने थे। जॉर्ज फर्नांडिस और चौधरी अजीत सिंह का भी इन्हें समर्थन प्राप्त था। चंद्रशेखर ने भी अपने विश्वासी रघुनाथ झा को उम्मीदवार बनाया। थोड़े अंतर से लालू प्रसाद चुनाव जीत गए, जिसमें निस्संदेह नीतीश कुमार के संचालन की महती भूमिका थी। मगर राज्यपाल यूनुस सलीम ने लालू प्रसाद को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने में 1 सप्ताह से अधिक का समय लगा दिया। जब देवीलाल खेमे ने राजभवन को घेरने की धमकी दी, उसके बाद ही 10 मार्च 1990 को शपथ ग्रहण को संभव हुआ। (पॉलिटिकल किस्सा का सोर्स: जेडीयू के वरिष्ठ नेता केसी त्यागी)

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