Philosophy of india

भारतीय दर्शन और उसका इतिहास

भारतीय दर्शन की सामान्य विशेषताएं

भारतीय दर्शन में आस्तिकतावादी तथा नास्तिकतावादी विचार, आध्यात्मिक तथा भौतिकवावादी, दोनों विचारधाराएं दृष्टिगत होती हैं। इन विचारधाराओं के आधार पर भारतीय दर्शन को विभाजित किया गया है। इनमें परस्पर अनके मतभेद हैं, तथापि इन दर्शनों में अनेक विचार एक समान तथा सर्वामान्य हैं। भारतीय दर्शन की सामान्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं!


(1) भारतीय दर्शन की उत्पत्ति मनुष्य के आध्यात्मिक असंतोष का परिणाम है। मनुष्य को अपने जीवन में अनेक दुखों का सामना करना पड़ता है। भारतीय दर्शन मनुष्य के लिए इस दुख से निवृत्ति का मार्ग प्रशस्त करता है, तथा दुख से निवृत्ति के लिए मोक्ष प्राप्ति को जीवन का चरम लक्ष्य मानता है। इस तरह भारतीय दर्शन व्यवहारिक दृष्टिकोण से चार्वाक के भौतिकतावादी दर्शन के अतिरिक्त मनुष्य की समस्याओं को हल करने की कोशिष करता है। डा. राधाकृष्णन ने लिखा भी है कि ‘‘भारत में दर्शन जीवन के लिए है‘‘।

(2) भारतीय दर्शन में अनैन्द्रिक अनुभूति [Non-sensuous Feeling]को केन्द्रिक अनुभूति [Sensuous Feeling], से श्रेष्ठ माना गया है! अनैन्द्रिक अनुभूति (आध्यात्मिक अनुभूति, Intuitive Feeling ), बौद्धिक ज्ञान से श्रेष्ठ मानी गई है! आध्यात्मिक अनुभूति द्वारा ही तत्व का वास्वतिक साक्षात्कार होता है। चंकि भारतीय दर्शन में तत्व का साक्षात्कार प्राप्त करना लक्ष्य निर्धारित किया गया है इसलिए भारतीय दर्शन को तत्व दर्शन भी कहा जाता है।

(3) चार्वाक के भौतिकतावादी दर्षन के अतिरिक्त सभी भारतीय दर्षन आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं!

(4) चार्वाक के भौतिकतावादी दर्शन के अतिरिक्त, षड्दर्शन तथा जैन तथा बौद्ध दर्शन में मनुष्य के कर्म के सिधान्त को स्वीकार किया गया है। अर्थात् मनुष्य के वर्तमान कर्म उसके भावी जीवन का निर्धारण करते हैं, जबकि वर्तमान जीवन पूर्वजन्मों के कर्मों का प्रतिफल है। भारतीय दर्शन में ‘कर्म सिधान्त‘ उसकी आध्यात्मिक विचारधारा की नींव कही जाती है !

(5) चार्वाक के अतिरिक्त सामान्यतः सभी भारतीय दर्शनों में पुनर्जन्म के सिधान्त को मान्यता दी गई है। पुनर्जन्म का विचार भारतीय दर्शन में कर्मवाद के सिधान्त तथा आत्मा की अमरता के विचार को प्रतिपुष्ट करता है। भारतीय दर्शन में स्वीकारा गया है कि मनुष्य की देह नाशवान है, परंतु आत्मा अमर है,तथा व्यक्ति को अपने वर्तमान कर्यों के आधार पर मृत्यु पश्चात् पुनर्जन्म प्राप्त होता है !

(6) चार्वाक को छोड़कर सभी भारतीय दर्शन अज्ञान को ही मनुष्य के दुखों का कारण मानते हैं। अज्ञान के कारण ही मनुष्य विविध बंधनो में जकड़ा रहता है, जो कि दुखों का कारण है। दुखों से मुक्ति के लिए ज्ञान प्राप्ति को अनिवार्य माना गया है!

ज्ञान की प्राप्ति से ही मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है और वह अनवरत जन्म-मृत्यु के सतत् क्रम से मुक्त हो जाता है !

(7) सभी भारतीय दर्शन मनुष्य के दुखों और अज्ञानता के निवारण के लिए व्यावहारिक उपाय प्रस्तुत करते हैं। ज्ञान के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति के साथ-साथ व्यावहारिक प्रक्रियाओं का प्रतिपादन भी किया गया है। मनुष्य को तप, साधना, योग करने हेतु प्रेरित किया है ताकि वह अपने मन, वचन, कर्म पर नियंत्रण कर सके।

(8) चार्वाक के अतिरिक्त भारतीय दर्शन नैतिकतावादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। मनुष्य के रूप में जीवन के लिए नैतिक मानक निश्चित किए गए हैं। मनुष्य को आत्मसंयम तथा आत्मनियंत्रण के द्वारा इन नैतिकताओं को स्वीकार करने का आग्रह किया गया है। सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अस्तेय, ब्रम्हचर्य सन्तोष, स्वाध्याय, शुचिता, आदि कई नैतिकताओं का मनुष्य को ज्ञान प्राप्ति हेतु पालन किए जाने का निर्देन्य भारतीय दर्शन देता है। इन नैतिकताओं का पालन करने से ही मनुष्य का जीवन, विवेकवान, तथा ज्ञानपूर्ण हेा सकता है। मनुष्य घृणा, वासना, हिंसा, आदि की कुप्रवृत्तियों से बच सकता है, तथा सत्कर्मों के माध्यम से अपने भावी जीवन को मुक्ति की प्राप्ति हेतु योग्य बना सकता है।

(9) सभी भारतीय दर्शनों में वेदों का गहरा प्रभाव दृष्टिगत होता है। षड्दर्शन में वेदों में वर्णित दार्शनिक विचारों के प्रति पुष्टि हुई है। बौद्ध जैन तथा चार्वाक के दर्शन यद्यापि वेदों को अस्वीकृत करते हैं तथापि इन दर्शनों में जिन वैदिक सत्यों का प्रतिवाद Antithesis, प्रस्तुत करते है, उससे ही इन दर्शनों पर वेदों का प्रभाव स्पष्ट हो जाता है!

(10) पाश्चात्य दर्शन के विपरीत, भारतीय दर्शन और धर्म परस्पर आबद्ध हैं। चार्वाक के अतिरिक्त सभी भारतीय दर्शन, धार्मिक स्वरूप के हैं। भारत में धर्म तथा दर्शन दोनों में ही मनुष्य के जीवन का चरम लक्ष्य समस्त अज्ञानता को दूर करके, दुखों से मुक्ति पाना, तथा मोक्ष प्राप्त करना है! भारत में धर्म तथा दर्शन परस्पर एक दूसरे के विकास में सहायक सिद्ध हुए हैं। धर्म ने मनुष्य के जीवन को विवेकवान तथा नैतिक बनाने के लिए नैतिक विकल्प प्रस्तुत किये हैं, वहीं दर्शन ने तर्कों के द्वारा इनका दार्शनिक पक्ष प्रस्तुत किया है!

(11) भारतीय दर्शन में ज्ञानमीमांसा [Epistemology], एक प्रधान अंग है। भारतीय दर्शन में उसे प्रमाण विज्ञान कहा जाता है। सत्य ज्ञान को ‘प्रमा‘ कहते है!

प्रमाण के द्वारा ही मनुष्य को वास्तविक ज्ञान प्राप्त होता है। सभी दर्शन में इनकी संख्या भिन्न भिन्न हैं। चार्वाक के अनुसार प्रत्यक्ष ज्ञान ही एकमात्र प्रमाण है। सांख्य दर्शन में अनुमान, प्रत्यक्ष तथा शब्द को प्रमाण के रूप में स्वीकार किया गया है!

भारतीय दर्शन में तत्वमीमांसा, प्रमाण विज्ञान पर आधारित है, अतः इन प्रमाणों को अत्यधिक महत्व प्रदान किया गया है !

(12) सामान्यतः भारतीय दर्शन में जगत को सत्य माना गया है। उपनिषेदों में जगत को ब्रम्ह की अभिव्यक्ति मानी गई है। जगत की उत्पत्ति ब्रम्ह की इच्छा से होती है तथा वह अंत में ब्रम्ह में ही विलीन हो जाती है। शंकर तथा योगाचार सम्प्रदाय जगत् को सत्य नहीं मानते, वे सिर्फ ब्रम्ह को सत्य मानते हैं, तथापि व्यावहारिक रूप से जगत् की सत्यता को भी स्वीकार किया है !

हीनयान और महायान के सम्बन्ध में रोचक जानकारी


आज हम बौद्ध धर्म की दो शाखाओं हीनयान और महायान के बीच अंतर और कुछ रोचक तथ्यों के बारे में जानेंगे. बुद्ध के निर्वाण के 100 वर्ष बाद ही बौद्ध धर्म दो सम्प्रदायों में विभक्त हो गया – 1. स्थविरवादी और 2. महासांघिक.

बौद्धों की द्वितीय संगीति वैशाली में हुई. इसमें ये मतभेद और भी अधिक उभर कर आये. अशोक के समय बौद्धों की तीसरी संगीति के समय तक इनमें 18 सम्प्रदाय (निकाय) विकसित हो गये थे. इनमें 12 स्थविरवादियों के तथा छ: महासान्घिकों के थे.

महासान्घिकों का एक ही सम्प्रदाय था – वैपुल्यवादी. महासांघिक सम्प्रदाय से ही महायान सम्प्रदाय का उद्भव और विकास हुआ.


महायान और हीनयान
महासंघिक सम्प्रदाय ने बुद्ध को अलौकिक रूप देने का प्रयत्न किया. इन्होंने बुद्ध की मूर्तियों की प्रतिष्ठा का प्रचार किया. इसके विपरीत स्थविरवादियों ने बुद्ध के मानव-रूप की रक्षा करने का प्रयास किया. स्थविरवादियों का मत था कि मनुष्य को दुःख निवृत्ति के लिए आत्म-कल्याण का प्रयत्न करना चाहिए.

इसके विपरीत महासान्घिकों का कथन था कि अर्हत् को अपने दुःख की निवृत्ति के लिए अपने तथा प्राणिमात्र दोनों के कल्याण की ओर प्रयत्नशील रहना चाहिए.

महायान और हीनयान – भिन्न शाखाएँ क्यों?
महायान शब्द का वास्तविक अर्थ इसके दो खंडों (महा+यान) से स्पष्ट हो जाता है. “यान” का अर्थ मार्ग और “महा” का श्रेष्ठ, बड़ा या प्रशस्त समझा जाता है. तात्पर्य उस ऊँचे या प्रगतिशील मार्ग से था, जो हीनयान से बढ़कर था. यह लोकोत्तर मार्ग था, जिसका ऊँचा आदर्श था और इसी के कारण ईसा पूर्व पहली शताब्दी में ही बुद्ध धर्म में विभेद हो गया.

वैशाली-संगीति में पश्चिमी तथा पूर्वी बौद्ध अलग-अलग हो गये, जिन्होंने त्रिपिटक में कुछ परिवर्तन किया. पूर्वी शाखा को महासंघिक का भी नाम दिया जाता है, जिससे आगे चलकर महायान का नामकरण किया गया. बोधिसत्त्व की भावना के कारण महायान बोधिसत्त्वयान के नाम से भी साहित्य में प्रसिद्ध है.

महायान और हीनयान में अंतर
महायान और हीनयान के दार्शनिक सिद्धांतों में अनेक मतभेद हैं. बुद्ध के जिस क्षणिकवाद की हीनयानियों ने वस्तों का अभावात्मक रूप कहकर व्याख्या की, महायानियों ने उसकी शून्यवाद के रूप में प्रतिष्ठा की. इनका कहना है कि शून्यवाद अभावात्मक नहीं है, अपितु व्याहारिक जगत से परे पारामार्थिक सत्ता विद्यमान है. यह लौकिक विचारों से अवर्णनीय होने के कारण ही अभावरूप कहलाती है. मन-वाणी से अगोचर होने के कारण ही यह शून्य है.

हीनयान और महायान के निर्वाण की कल्पना में भी थोड़ा-सा मतभेद है. हीनयान के अनुसार निर्वाण सत्य, नित्य, पवित्र और दुःखाभावरूप है. महायानी इस निर्वाण की प्रथम तीन विशेषताओं को स्वीकार करके अंतिम विशेषता में परिवर्तन करते हैं. इनका निर्वाण वेदांत की मुक्ति के सदृश है.

यह भी दृष्टव्य है कि हीनयान सम्प्रदाय के ग्रन्थ अधिकतर पाली भाषा में है, जबकि महायान सम्प्रदाय के ग्रन्थ संस्कृत भाषा में है.

महायान सम्प्रदाय ने जीवन का एक नया उच्च आदर्श जनता के समक्ष प्रस्तुत किया. उन्होंने कहा कि प्राणिमात्र के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर देना ही परम कर्तव्य है. परकल्याण के लिए कुछ भी अदेय नहीं है. इस हेतु उन्होंने बुद्ध के अनेक पूर्व जन्मों की कल्पना बोधिसत्व के रूप में की. बुद्ध पद प्राप्त करने से पहले सिद्धार्थ ने बोधिसत्व के रूप में अनेक जन्म लिए थे. उन्होंने दु:खों से संतप्त प्राणियों की पीडाओं के निवारण के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया था. महायानियों का कथन था कि मनुष्य को चाहिए कि केवल अपना कल्याण ही न करे, अपितु प्राणिमात्र का भी कल्याण करे. सबका कल्याण करने की प्रवृत्ति के कारण उन्होंने अपने को महायानी कहा. शेष बौद्धों को केवल आत्म-कल्याण करने में संलग्न होने के कारण उन्होंने हीनयान नाम दिया क्योंकि इसमें बहुत लोग सवार नहीं हो सकते हैं. हीनयान का साधक अपने ही निर्वाण का प्रयत्न करता है. महायान का साधक अधिक उदार लक्ष्य रखता है.

दोनो मे अंतर स्पष्ट करे.

महायान और हीनयान में अंतर
हीनयान

महायान

हीनयान दोनों यानों में अधिक पुराना है

महायान के बारे में कहा जाता है कि वह पहली शताब्दी ई.पू. उभर कर आया

हीनयान में पालि भाषा का महत्त्व है

संस्कृत भाषा का महत्त्व है

मुख्य रूप से दक्षिण.पू. एशिया (वियेतनाम छोड़कर) में फैला हुआ है

इसका प्रचार भारत के उत्तर में अधिक है, जैसे – तिब्बत, चीन, मंगोलिया, जापान, उ.कोरिया आदि.

हीनयान में बुद्ध को शाक्यमुनि के रूप में जाना जाता है

महायान में बुद्ध एक भगवान् हैं जिनके कई पिछले जन्मों के रूप (बोधिसत्व) हैं और भविष्य में भी कई बुद्ध होने की कल्पना है, जैसे – मैट्रैक

हीनयान अनित्यता, दु:खता और अनात्मता को मानता है

महायान आगे बढ़कर इसमें शून्यता जोड़ता है

हीनयान से साधक को व्यक्तिगत निर्वाण की प्राप्ति होती है

महायान का आदर्श समस्त संसार को मुक्त कराने का है

हीनयान पुद्गल-शून्यता को मानता है

महायान धर्म-शून्यता को

हीनयान में छह पारमिताएँ बतलाई गई हैं

महायान में दस पारमिताओं का बारम्बार वर्णन है

हीनयान में ध्यान-योग का महत्त्व है

महायान करुणा-प्रधान है. बोधिसत्व का लक्ष्य केवल अपनी बुद्धत्व को प्राप्त करना नहीं, किन्तु सहस्त्र प्राणियों को बुद्धत्व का लाभ कराना है. इसलिए महायान में असंख्य बुद्धों और बोधिसत्वों की कल्पना की गई है और बोधि-चित्त की प्राप्ति के लिए मार्ग बतलाया गया है. दस भूमियाँ – मुदिता, विमला, प्रभाकारी, अचिंष्म्ती, सुदुर्जया, अभिमुक्ति, दूरंगमा, अचला, साधुमति, धर्ममेध महायान की विशेष देन हैं इसका वर्णन हीनयान में नहीं के बराबर है

बुद्धों की विशेषताएँ यथा – दस बल, चार वैशारद्य, बत्तीस महापुरुष – लक्षण, अस्सी अनुव्यंजन, अष्टादश आवेणिक धर्म यद्यपि हीनयान में भी मिलते हैं

महायान में इनका विशेष वर्णन किया गया है और इनकी प्राप्ति के लिए सतत प्रयत्न करने को कहा गया है

हीनयान में अर्हत्व पद एक गौरवपूर्ण पद माना गया है. स्वयं भगवान् बुद्ध भी अर्हत् कहे गये हैं

महायान में प्रज्ञापारमिता की प्राप्ति की बहुत प्रशंसा की गई है. महायान प्रत्येकबुद्ध और श्रावक को हीन दृष्टि से देखता है. “श्रावक” और “अर्हत्” शब्द का प्रयोग महायान में समान रूप में किया गया है. महायान में सम्यक सम्बोधि ही चरम लक्ष्य मानी गई है. महायान आत्मार्थ को छोड़कर परार्थ की प्राप्ति के लिए प्रेरित करता है

हीनयान में ध्यान आदि साधनाओं पर अधिक जोर दिया गया है

महायान में बुद्धों की पूजा का विशेष वर्णन मिलता है

हीनयान में साधक निर्वाण-प्राप्ति से ही संतुष्ट हो जाता है

महायान में बुद्ध-ज्ञान, सर्वज्ञता, अनुत्तरज्ञान या “सम्बोधि” जिसे “तथता” भी कहा गया है, उनके लिए सत्व प्रयत्नशील होता है

हीनयान का परमार्थ महायान के लिए संवृति-सत्य है

महायान का परमार्थ सत्य या परिनिषपन्न सत्य तो केवल धर्म-शून्यता है

हीनयान शील और समाधि-प्रधान है

महायान करुना और प्रज्ञा-प्रधान है