श्री ओम प्रकाश गुप्ता,अवकाश प्राप्त अध्यापक, विभाजन कालीन भारत के साक्षी

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डूंगा बाजार, कांगड़ा जन्म 28 दिसंबर, 1934 कांगडा (हिं. प्र.)
मेरे पिताजी श्री जानकीदास जी की किरयाने की दुकान थी । मैने सन 1943 में लगङग 6 वर्ष की आयु में संघ शाखा में जाना शुरु कर दिया था। उन दिनों ठाकुर रामसिंह जी यहाँ जिला प्रचारक थे।
उस समय कांगड़ा में दो सांय और प्रभात शाखा थी। प्रभात शाखा गुप्तगंगा पर लगती थी। सांय शाखा एक गुप्तगंगा पर और दूसरी जी.ए.वी स्कूल के मैदान में लगती थी।


कांगड़ा नगरपालिका क्षेत्र में न्या कांगगड़ा व पूराना कांगड़ा दोनों ही शामिल थे। आबादी लगभग छ:-सात हजार थी। इसमें से मुसलमानों की आबादी लगभग 600-800 होगी।
डुंगा बाजार के महाजन मुहल्ले में 100-150 मुसलमान थें। ये लोग प्राय: तेली और दर्जी थे। अस्पताल के पास लगभग 50 थे, जो प्राय: दस्तकार थे। बाटा गली में 25-30 जुते बनाने का काम था, इनमें एक दुकान सब्जी की थी। गुप्तगंगा मार्ग पर दुरुद्वारा के पास एक ‘दारूकुट’ खानदान रहता था। इस खानदान में लगभग 50 लोग थे। इनका काम दारू कुटना ( शराब बनाना) था, इसलिए से ‘दारूकुट’ कहलाते थे। ये बहुत संपन्न थे।


पूराना कांगड़ा के दो भाग थे—एक परेट व दूसरा भनेट। दोनों ही भागों में लगभग 250-250 मुसलमान रहते थे। ये लोग आमतौर पर मजदूरी करते थे।यहाँ कई मुसलमान जज (न्यायाधीश) आए। वे मुसलमानों के पास निस्संकोच होकर जाते थे और उनके साथ हुक्का भी पीते थे।
हिन्दुओं के मुसलमानों के साथ अच्छे संबंध ते। इसके साथ ही जैसी की सब जगह परम्परा थी। हिन्दू और मुसलमान एक-दूसरे के यहाँ पर खाना नही खाते थे। हमारे यहाँ कोई शादी होती थी, तो हम दारुकुटों से उनके वर्तन मंगवाते थे और उनमें खाना डालकर हम उनके यहाँ भिजवाते थे। इसी तरह उनके यहाँ जब कोई शादी वगैरह होती थी तो वे हमें सुखी सामाग्री भेज देते थे, क्योंकि हम उनके यहाँ का बना हुआ सामान नही खाते थे।


1947 में मैं सांतवी कक्षा में पढ़ता था और संघ शाखा में तो जाता ही था। उस समय यहां प्रचारक थे श्री सुन्दरलाल जी और संघ चालक थे माधवराम कायस्थ, एडवोकेट। लाहौर से हिन्दुओं की कटी हुई गाड़ी के अमृतसर पहुँचने का समाचार जब कांगड़ा पहुँचा तो यहाँ के हिन्दुओं में भी रोष भर गया। महाजन मुहल्ले में फैजी नामके एक मुसलमान को , जो कि रंगरेज था, रविन्द्र नाम के एक हिन्दू ने मार दिया। इससे मुसलमानों में डर फैल गया। ऐसा भी सुनने में आ रहा था कि दारूकुटों ने अपने यहाँ कुछ असलहा इकट्ठा किया हुआ है, लेकिन फैजी के मारे जाने से सब पस्त हो गए। सब मुसलमान तहसील में इकट्ठे हो गए, वहाँ से प्रशासन ने उन्हे पुलिस की सुरक्षा में योल कैम्प पहुँचा दिया। दारूकुटा भी चले गए।


दारूकुटों के चले जाने के बाद उनके तीन-चार दुकानों को आग लगा दी गई। आग लगने पर वहाँ काफी पटाखे से छुटे। इससे पता लगा कि उन्होंने अपने यहाँ काफी गोला बारुद इकट्ठा कर रखा था। लेकिन वे कुछ भी कर नही पाए और डर के मारे भाग गए। नगरपालिका कार्यालय के पास एक मस्जिद भी उसे भी लोगों ने आग लगा दी।


कांगड़ा-धर्मशाला सड़क पर कांगड़ा से लगभग आठ किलोंमीटर के अन्तर पर गग्गव है। गग्गल के पास ही चाचड़ नाम का गाँव है। इस गाँव में कुछ मुसलमान के घर के घर थे। पहाड़ों के ऊपर से आस-पास के गुज्जर (मुसलमानों के एक जाति, जो चरवाहे होते है) भी उतरकर वहाँ इकट्ठे हो गए। इससे वहाँ के हिन्दुओं के कान खड़े हो गए।


आस-पास के गाँवों गग्गल, चाचड़, बगली आदि में प्राय: राजपूत आबादी थी। इन सब गाँवों के लोगों नें मिलकर चाचड़ के मुसलमानों पर हमला कर दिया। 100-150 मुसलमान मारे गए। उनकों वही पास ही बह रही खड्ड में फेंक दिया। बरसात का मौसम था। लाशें बह गई।


पश्चिम पंजाब के डेरा इस्माइल खाँ से कुछ शरणार्थी आए। उन्होंने अपनी दास्तानों सुनायी। उनमें से कुछ औरतों के स्तन काट दिये गए थे, यह मैने खुद देखा था। उन की कहानियाँ सुनकर और दशा देखकर किसा भी खुन खोलने लगता था।मै बाद में अध्यापक हो गया। 1953 जी.ए.वी. स्कूल कांगड़ा में और उसके बाद सरकरा स्कूल में। 1993 में मैने अवकाश प्राप्त किया।

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