मेरा देश बड़ा अजीब है, अब ठोको ताली

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एक हिंदी फिल्म में खान गैंग के हीरो सलमान खान बजरंगी भाईजान बना हुआ है। फिल्म के किरदार में बजरंगी भाई जान एक पाकिस्तानी लड़की को उसके घर यानि पाकिस्तान पहुँचा दिया। दर्शकों नें इस पर खुब तालियाँ बजाया। अब जबकि करोड़ों रोहिंग्या और बंग्लादेशी को देश के गृहमंत्री (अमित शाह) मोटा भाई उसको घर भेज रहा है तो अब्दुल उसका विरोध क्यों कर रहा है। उसको तो खुश होना चाहिए। एक बात और है मोटा भाई पाकिस्तान , अफगानिस्तान और बंग्लादेश में रह गए हिंदुओं को भी वापस अपने घर बुला लिया है। तो ठोको ताली…

अगर हर मस्जिद में मदरसा हो सकता है, हर चर्च में मिशनरी स्कूल हो सकता है , तो भारत के जितने सक्षम मंदिर है उसमें गुरुकुल क्यों नही। भारत को सक्षम और समृद्धशाली सभ्यता और संस्कृति को जीवित रखना हर भारतवासियों का कर्तव्य है। मंदिर में पुजारी सिर्फ इसलिए नही रखा जाना चाहिए कि वो दो मंत्र पढ़कर पूजा कराले। पुजारी को वैदिक ज्ञान होना आवश्यक होना चाहिए। खाली समय में वैदिक ज्ञान के प्रचार प्रसार पर ध्यान देना चाहिए ना कि राजनीतिक और अनैतिक बातों पर। इसके लिए विचार करने की उतम समय है।

मोदी को बदनाम करने के लिए रोहित बेमुला के माता को 20 लाख का आफर।

दुश्मन अगर आमने सामने की युद्ध में परास्त होता है तो वह पीछे से छुप के बार करता है। कई तरीके का साजिश करता है। भारत भी आज कल साजिश का केन्द्र बना हुआ है। जहाँ पर वर्तमान सत्ता को गिराने के लिए तरह तरह के साजिश किया जा रहा है। एक अखबार में छपी खबरों के मुताबिक रोहित बेमुला के मां को मोदी के खिलाफ बोलने के लिए 20 लाख का आफर दिया गया , जो कि आज तक नही मिला। यह आफर मुस्लिम लीग की तरफ है दिया गया था।

हैजराबाद युनिवर्सिटी के हास्टल में सुसाइड करने वाले दलित छात्र बेमुला को लेकर राजनीति खुब गरमाई थी। जिसके बाद प्रशांत पटेल नें इस मामले को ट्वीट किया और दावा किया कि रोहित बेमुला के आत्महत्या के बाद इंडियन युनियन मुस्लिम लीग ने रोहित के मां राधिका वेमुला को प्रधानमंत्री के खिलाफ बोलने के लिए 20 लाख रुपये का आफर दिया था , जो कि आज तक दिया नही। आपको याद तो होगा ही कि किस प्रकार से मुस्लिम युनियन लीग के लोग अपने जलसा में रोहित के मां को विशेष अतिथि के तौर पर बुलाती थी ताकि मोदी सरकार के खिलाफ बुलवाया जाय और दलित समाज मोदी के विरोध में खड़ा होकर मुसलमानों का समर्थन करे।

सबसे बड़ी बात एक बार 2 लाख का चेक भी दिया लेकिन वह भी बाउन्स हो गया। रोहित बेमुला की मां ने टीएनएन न्यूज के माध्यम से खुद इस बात को स्वीकार किया या कहे कि खुलासा कर चुकी है। उन्होंने बताया कि रोहित के मौत के कुछ समय बाद मुस्लिम लीग के कुछ लोगों ने उनसे संपर्क साधा था।

राधिका वेमुला ने टीएनएन न्यूज से बताया कि उनकी आर्थिक स्थिति को देखते हुए उन्होंने 20 लाख रुपया और एक घर देने का वादा किया था, जिसके बाद उन्हें केरल की एक जनसभा में ले जाया गया। इस जनसभा के बाद राधिका वेमुला को कई रैलियों में बुलाया गया। उन्हें पैसे देने का वादा तो किया लेकिन कुछ दिया नही।

धर्म एक धंधा है, धर्म धंधा नही एक शुद्ध व्यवसाय है। धंधा तो कोठे पर होते है दलालों के ——-

वामपंथियों को कशमशाहट को समझना बहुत जरूरी है। कभी आरक्षण के नाम पर तो कभी धर्म और जाति के नाम पर बांटने वाले तथा कथित लिबरल लिब्राण्डू वामपंथी और मंदिर के जरिये ब्राह्मण और बांकि में लड़ाने की नाकामयाब कोशिश करने में लगे है। हो सकता है कि कामयाब भी हो जाय।

इसी को लेकर आज एक वामपंथी ने ट्वीट किया, जिसमें लिखा था धर्म एक धंधा है, एससी एसटी और ओबीसी मंदिर मे दान देना और प्रसाद चढाना बंद करे। क्योंकि उस दो कोड़ी के प्रोफेसर को ये लगता है या जानबुझकर भड़काने के लिए ऐसा लिखता है। इस प्रसाद के सहारे ही ब्राह्मण का परिवार चलता है और उससे मोटी कमाई होता है। जबकि ऐसा बिल्कुल नही है। मंदिर में सबसे ज्यादा दान बनिया समाज देता है, और मंदिर से सबसे ज्यादा कमाता भी बनिया ही है। निश्चित तौर पर भगवान किसी को भी निराश नही करते। जो देगा वही लेगा। अन्यथा दो कोड़ी के वामपंथी प्रोफेसकर की तरह चाईना का एजेंडा चलाकर देश से गद्दारी करना पड़ता है अपने पेट भरने के लिए।

अब मै आपको यह भी समझाता हूँ कि धंधा कैसे है। हालांकि धंधा एक खराब शब्द है तो यहाँ पर हम व्यवसाय कहते है। धंधा कोठे पर होते है, जहाँ देश के दलाल और गद्दारों की ——

मंदिर के जरिये एक व्यवसाय वह भी शुद्ध व्यवसाय जो कि भारतीय सनातन धर्म और भारत भूमि के साथ-साथ प्रकृति से जुड़े व्यवसाय होते है। जैसे कि मान लिया। मंदिर में लड्डू का प्रसाद चढाया जाता है। अब लड्डू बनाने वाला एक मिठाई का दुकान है। यह दुकान किसी भी जाति का हो सकता है। कई जगह तो मजहबी लोग भी लड्डू बेचते नजर आ जाते है। अब एक मिठाई के दुकान में कितने लोग काम करते है उन सबका रोजी रोटी मंदिर के कारण चलता है। जिसमे विभिन्न जाति के लोग काम करते है। इसके अलावा मिठाई के दुकान में दुध चीनी के अलावा बहुत सारे जगहो से सामाग्री आते है, उनका रोजगार भी जुड़ा हुआ है। मंदिर के बाहर आपने फूल वाले को बैठे देखा होगा, वह फूल माला इत्यादि बेचता है उसका परिवार भी चलता है और जिस किसान से खरीद कर लाता है उसके हिस्से में भी कुछ आता है।

मंदिर के आमने सामने आपने बहुत सारे फल वाले के दुकान भी देखा ही होगा। क्योंकि ज्यादातर लोग फल भी चढ़ाते है। फल बेचने वालों में आजकल ज्यादातर वही लोग है जो मंदिर में जाने वालों से नफरत करते है और काफिर भी कहते है। जो मंदिरों को मिटाना चाहते है उस अब्दुल के चार या आठ बच्चों को लालन पालन भी मंदिरों के कारण ही होता है। इसके साथ ही सैकड़ो सामान है जो लोग खरीदते है। जिसमें धुप अगरबती और भी दूसरे प्रकार के सामान है। तो यह शुद्ध बिजनस है। एक बात और बताना चाहता हूँ मंदिरों से ब्राह्मण के परिवार नही चलते है, सिर्फ 0.5 प्रतिशत ब्राह्मण ही इससे जुड़ा हुआ है। जबकि ज्यादातक ब्राह्मण उसमे दान देने वालों में से है, जिससे चर्च और मस्जिद के मौलवियों को तन्ख्वाह दी जाती है। जहाँ मंदिर होता है वहाँ कि प्राप्रटी के दाम बढ जाते है। सिर्फ हिंदुओं के मंदिर और त्योहारों के कारण 25 प्रतिशत लोग अपना जीवनयापन कर पाते है।

दूसरी तरफ हम अगर बात करे मजहब की तो वहाँ क्या धंधा नही हो रहा है। अरबो खरबों के जानवरों की खरीद बिक्र और फिर उसका हत्या। लेकिन तथा कथित लिबरल को मजहब के नाम पर होने वाले क्रुर्रता पर बोलने के बजाय शुद्ध शाकहारी व्यवसायी से नफरत है।

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