• महर्षि दयानन्द जी द्वारा इस्लाम का खण्डन और फैजुल्ला खां…

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• स्थान :जोधपुर • समय : 1883 ई.
(महर्षि जी के जीवन का अंतिम वर्ष)

जोधपुर निवास काल में कुछ मुसलमान सज्जन भी धर्म चर्चा के लिए यदा कदा स्वामीजी के पास आते थे। इनमें नवाब मोहम्मद खाँ, कर्नल मुहीउद्दीन तथा इलाहीबख्श कामदार के नामों का उल्लेख मिलता है। नवाब साहब शिया थे, अतः वे सुन्नी मुसलमानों की अधिकांश मान्यताओं को स्वीकार नहीं करते थे।

जोधपुर राज्य के मुसाहिब (मन्त्री) भैया फैजुल्ल्ला खाँ भी दो तीन बार स्वामीजी से मिले। मियाँ साहब राज्य के प्रमुख पद पर प्रतिष्ठित थे तथा सारा शासनतन्त्र उनकी अंगुलियों के संकेत से संचालित होता था। महाराजा जसवन्तसिंह के वे पूर्ण कृपापात्र थे, अतः राज्य के अन्य जागीरदार तथा सरदार भी मियाँ साहब की कृपा के आकांक्षी रहते थे।

व्याख्यान में एक बार जब महाराज ने इस्लाम की अनेक अवैज्ञानिक तथा तर्कहीन बातों का उग्र खण्डन किया, तो फैजुल्ला खाँ का भतीजा मोहम्मद हुसैन अपने हाथ को तलवार की मूठ पर रखकर क्रोधावेश में बोल पड़ा, “आप हमारे मत के विषय में कुछ न कहें।” इस पर स्वामीजी ने उसे फटकारते हुए कहा, “तुम अभी अनुभवशून्य हो। तलवार पर हाथ धरना तो जानते हो, परन्तु उसे म्यान से बाहर निकालना दुष्कर कार्य है।” पुनः अपने अदम्य व्यक्तित्व तथा निर्भीक वृत्ति का परिचय देते हुए कहा “मैं ऐसी धमकियों में आने वाला नहीं हूँ। यदि प्राणों की चिन्ता से ही मैं धर्मोपदेश करने तथा पाखण्ड खण्डन के कार्य से विरत हो गया होता, तो उस महत् अनुष्ठान की पूर्ति के लिए कुछ भी करना मेरे लिए असम्भव ही था, जिसके लिए मैं प्राणपण से यत्नशील हूँ।”

स्वामीजी के इन निर्भीक उद्गारों को सुनकर मियाँ फैजुल्लाखाँ लज्जित तो अवश्य हुए, किन्तु मन के भीतर महाराज के विरोधी भी बन गये।

एक दिन वार्तालाप के प्रसंग में मियाँ साहब ने स्वामीजी से कहा, “यदि आज मुसलमानों का शासन होता, तो आपके इस्लाम खण्डन को कदापि सहन नहीं किया जाता और आपका इस प्रकार भाषण करना कठिन हो जाता।” निर्भीकमना दयानन्द का उत्तर था, “मैं यदि मुसलमान शासनकाल में होता, तब भी इसी प्रकार की बात कहता और यदि औरंगजेब की परम्परा का कोई शासक मेरा अनिष्ट चिन्तन करता तो मैं भी किसी शिवा, दुर्गादास अथवा राजसिंह जैसे क्षत्रिय को आगे कर देता, जो उसे मजा चखा देता।”

वस्तुत: स्वामी दयानन्द पाखण्डखण्डन के कार्य में अकुतोभय भाव से ही लगे थे। वे संसार में ईश्वर को छोड़ कर अन्य किसी का भय नहीं मानते थे।

  • डॉ. भवानीलाल भारतीय
[ स्रोत : “नवजागरण के पुरोधा दयानंद सरस्वती”, प्रथम संस्करण 1983 ई., पृ. 505 ]
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