कैसे बनेगा देश खेलों में महान जब एक स्कूल में रसोईया और शारीरिक शिक्षक दोनों होंगे बराबर ….

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वतन कीआवाज अभी हाल ही में जब सीबीएससी ने कक्षा 1 से आठवीं तक शारीरिक शिक्षा और खेलकूद की प्रतिदिन 1 क्लास लगाने का सर्कुलर निकाला तो सभी ने हर्ष व्यक्त किया ।लेकि यह हर्ष ज्यादा दिनो तक नही रहा, कारण स्कूलों ने इस सर्कुलर को मान तो लिया लेकिन बर्ताव बिल्कुल ऐसा जैसे उनको शारीरिक शिक्षा नही खाना बनाने वालो के लिए सर्कुलर मिला हो। इसका जमीनी हकीकत इन सब चीजों से कोसों दूर है।,आवासीय शिवराम सिंह स्कूल बाराबंकी का मामला है।

मैं आप लोगों के सामने उत्तर प्रदेश के एक स्कूल के द्वारा निकाली हुई विज्ञप्ति को रख रहा हूं । जहां एक प्रशिक्षित शारीरिक शिक्षक और रसोईया की तनख्वाह एक बराबर रखी गई है । जबकि सामान्यतछ  दूसरे सब्जेक्ट की शिक्षक की  तनख्वाह इन से दुगनी से भी अधिक रखी गई है । शारीरिक शिक्षक जो किताब से ज्यादा शारीरिक मेहनत करके एक मकाम को हासिल करता है।

उसे हर रोज एक नये प्रकार के प्रतिस्पर्धाओं का समाना करना पड़ता है। शरीरिक शिक्षक किसी भी दूसरे शिक्षक से अधिक मेहनत करता है। उसकी मेहनत के परिणाम स्वरूप बच्चे अभिभावक तथा स्कूल के नाम राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचता है। बहुत से स्कूल खेल कूद के नाम पर अभिभावक से अधिक पैसे भी वसूलते पाये गये है।

शारीरिक शिक्षा आज से नही प्राचीन काल से ही शिक्षा मे सबसे अहम रहा है। लेकिन अफसोस है कि व्यवसायिक शिक्षा के इस दौड़ मे इसके महत्व को एक रसोइये के बराबर है।  आप से मेरा अनुरोध है की  देश में खेल और शारीरिक शिक्षा के हित में इस खबर को प्राथमिकता से लेते हुए शारीरिक शिक्षक का वेतन अन्य शिक्षकों के बराबर हो सके ऐसा प्रयास करना है भारत मे विभिन्न स्तर पर खेल को बढ़ाने के लिए प्रयास किये जा रहे है ऐसे मे स्कूल के द्वारा इस प्रकार की वर्ताव नींदनीय ही कहा जा सकता है। निश्चित रूप से यह प्रयास देश में खेलों का स्तर पर कारगर साबित होगा फिजिकल एजुकेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पेफी) ने देशभर में लोगों से अपील की है कि वह स्कूल प्रबंधन के आगे ईमेल के द्वारा अपनी बात रखें और बताएं कि रसोईया और शारीरिक शिक्षक दोनों में क्या अंतर होता है …

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वत्तन की आवाज़