राष्ट्रवाद पर भारी मुफ्त की बिजली पानी

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हमने बचपन से ही अपने गुरु से सीखा है कि राष्ट्र सर्वोपरी होता है। राष्ट्र के लिए सबकुछ न्योछावर किया जा सकता है। गुरुजी हमेशा से कहते रहे राष्ट्र सर्वोपरी । लेकिन अब इस देश के जनता ने एक नया स्लोगन दिया है। उसने राष्ट्रहित में से राष्ट्र हटाकर हित सर्वोपरी कर दिया है। अब तक तो हमने ऐ कहते हुए सुना था कि नेता किसी का नहीं होता है, लेकिन अब कहना होगा कि जनाता राष्ट्र का भी नहीं होता है।

इसका रुझान सरकार के द्वारा धारा 370 हटाने के बाद हुए हरियाणा चुनाव के बाद से ही देखने को मिलने लगा था। जिसमें हरियाणा के जनता ने बीजेपी को राष्ट्रवाद पर नकारने की कोशिश की क्योकि राष्ट्रहित तो तब होता जब जनता 70 साल से लटके इस मामले को सुलझाने पर सरकार को पूरा समर्थन देती।

हालॉकि महाराष्ट्रा में मामला कि ठाक रहा था। लेकिन राष्ट्रवाद के हिसाब से बहुत ही कम। सबसे बड़ी बात शिवसेना जो अपने चरित्रो को जीता था उसने ही सरकार और भारतीय जनता पार्टी के दामन छोड़ दिया। राम मंदिर बाला साहेब का सपना था, जिसे अब सरकार पूरा करने जा रही है।लेकिन बाला साहब के सपना पूरा होने से पहले ही शिवसेना ने ही उस सपने को दराकिनार कर दिया और हाथ थाम लिया। जिसे बाला साहेब ठाकरे नमस्कार लेना भी स्वीकार नहीं करते थे वो आज गलबहियाँ करने लगा है।

इसके बाद सरकार ने कई राष्ट्रीय मामले को निपाटाया है। भारत को सुरक्षित रखना के लिए NRC और CAA जैसी कानून को पास किया। जनसंख्या नियंत्रण के लिए NPR लाने कि तैयारी, मुस्लिम महिलाओं के लिए तीन तलाक बिल राम मंदिर बनाने की घोषणा और अब युनिफार्म सिविल कोड की तैयारी ।

लेकिन इन सब पर भारी पड़ता जा रहा है, जनता के स्वार्थ और धीरे-धीरे यह राष्ट्रहित से भी ज्यादा सवोंपरि हो चुक है। विकलांग मानसिकता इस भारत को दूबारा से गुलाम बनाने की कगार पर लाकर खड़ा कर देगा। आखिर कब तक कोई फ्रि खिलायेगा। लेकिन गुलाम मानसिकता भारत के डीएनए मे जो बसा है।

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