‘ज्ञानवापी’ शिव के भाष्य से पड़ा नाम

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ज्ञानवापी को लेकर मुकदमा में नियम कानून का हवाला दिया जाय या बात जांच परख तक आए। लेकिन शास्त्र-पुराण के पन्ने नीर-क्षीर विवेचन करते नजर आते है। दृष्टांतो व उद्धरणों के साथ इतिहास एक आईना बन जाता है। बात जब शिव तक पहुँच जाती है, जो शिव इस क्षेत्र में वास करते है। इसका जिक्र ‘स्कंद पुराण’ के काशी खंड में आता है। ज्ञानवापी परिसर के पुरातात्विक सर्वेक्षण से संबंधित मुकदमे में वाद मित्र विजय शंकर रस्तोगी की ओर से इस ग्रंथ के 16 पृष्ठ भी बतौर साक्ष्य कोर्ट में पेश रखे गये है।

‘स्कद पुराण’ का ‘काशी खंड’ ज्ञानवापी से देवाधिदेव महादेव के जुड़ाव की कहानी बताता है। इसमें जिक्र आता है कि आनन्द कानन में विचरण करते माता पार्वती की नजर महालिंग पर गई। उन्होंने उत्सुकता जताई तो महादेव नें इसे स्वयंभू और अपनी ही महिमा से प्रस्फुटित बताया है। माता पार्वती ने जब अभिषेक की इच्छा जताई तो जल प्रबंध की दृष्टि से भगवान शिव ने अपना त्रिशुल फेका और जलधार फुट पड़ी। इसकी उल्लेख कुछ इस प्रकार की है : उसी समय दक्षिण दिशा के समीप में भगवान शम्भू ने अपने त्रिशूल के द्वारा खनन किया था। रुद्रदेव ने बड़े वेंग से परम प्रचकुंड तैयार कर दिया।

अपने भाष्य में बाबा नें कहीं कि इस दिव्य क्षेत्र जो कुआँ है, उसक् जल में ज्ञान क्षेत्र के रूप में जगत में विख्यात होगा। इसे ही ‘ज्ञानकूप’ औऱ परिसर ‘ज्ञानवापी’ कहा गया।

श्रीकाशी विद्वत परिषद के महामंत्री बीएचयू प्रोफेसर रामनारायण द्विवेदी बताते है कि प्राचीन ग्रंथ ‘तीर्थ चिंताणी’ में उल्लेख है कि ‘अविमुक्त का स्थान ज्ञानवापी था। बनारस के उत्तर में आदि महादेव नाम लिंग था।’ ‘कृत्य कल्पतरु’ ग्रंथ में स्पष्ट वर्णन है क् अविमुक्तेश्वर के दक्षिण में सुन्दरवापी है, जिसके जलपान से मनुष्य के हृदय में तीन लिंग उत्पन्न होते है। उसकी रक्षा पश्चिम में दंडपाणि, पूर्व में तारकेश्वर और उत्तर में नंदीश्वर व दक्षिण में महाकालेश्वर करते है। यह वापी ही ‘ज्ञानवापी’ है।

प्राचीन साहित्य व अभिलेखों में अविमुकतेश्वर शिव की प्रधानता थी, मुगलकाल और उसके कुछ पहले यह नाम बदलकर विश्वेश्वर हो गया । उस काल में प्रधानता तो अविमुक्तेश्वर के स्वयंभू लिंग की थी। आचार्य वाचस्पति मिश्र 10वीं सदी के समय विश्वेश्वर और अविमुक्तेश्वर का एकत्व मान लिया गया। ‘तीर्थ चिंतामणि’ ग्रंथ में कहा गया है कि अविमुक्तेश्वर ही लोक में विश्वनाथ शिवलिंग के रूप में प्रसिद्ध है।

श्रीरामयत्न शु्कल , श्रीकाशी विद्वत परिषद के अध्यक्ष।

लक्ष्मीधर ग्रंथ में भी पृष्ठ संख्या 121 व 123 तक विश्वेश्वर मंदिर के ज्ञानवापी में अवस्थित होने और अविमुक्तेश्वर मंदिर का उल्लेख है। ये सभी ग्रंथ सनातन धर्म के सर्वमान्य ग्रंथ ‘ धर्म सिंधु’ व ‘निर्णय सिंघु’ के ही काल के है जो काफी प्राचीन है।

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