वैश्विक समन्वयक माधवराव बनहट्टी

Spread the love

19 फरवरी/जन्म-दिवस

संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री माधवराव बनहट्टी का जन्म 19 फरवरी, 1927 को नागपुर में हुआ था। उनके पिताजी नागपुर विद्यापीठ में मराठी साहित्य के प्राध्यापक थे। माधवराव सब संतानों में बड़े थे। 1945 में बी.एस-सी. करने के बाद उन्होंने एक वर्ष डाक-तार विभाग में नौकरी की। फिर उन्होंने प्रचारक बनने का निर्णय लिया। इससे नाराज होकर उनके पिताजी ने श्री गुरुजी को बहुत कड़ी बातें कहीं। उस समय माधव की अवस्था 19 वर्ष थी।

माधवराव को सर्वप्रथम बंगाल के बांकुड़ा जिले में भेजा गया। वहां वे कार्यकर्ताओं में ‘माधव दा’ के नाम से लोकप्रिय हो गये। तीन साल में उन्होंने स्थानीय भाषा, भूषा और खानपान अपना लिया। उन्हें देखकर कोई नहीं कह सकता था कि वे बंगाल के मूल निवासी नहीं हैं।

एक बार उनके माता-पिता तीर्थयात्रा हेतु बंगाल गये। जिस दिन वे कोलकाता में थे, उस दिन वहां ‘शहीद मीनार’ पर श्री गुरुजी का कार्यक्रम हो रहा था। उसमें 10,000 गणवेशधारी स्वयंसेवक तथा हजारों नागरिक उपस्थित थे। इससे उन्हें बहुत संतोष हुआ कि उनके पुत्र ने एक श्रेष्ठ कार्य के लिए अपना जीवन लगाया है।

1947 में पूर्वी पाकिस्तान से आये हिन्दू विस्थापितों की सेवार्थ ‘वास्तुहारा सहायता समिति’ बनाई गयी। माधव दा 1949 से 52 तक उसके कार्यालय सचिव रहे। कोलकाता से संघ की ओर से ‘स्वस्तिका’ नामक साप्ताहिक बंगला पत्र प्रकाशित होता है। 1953 से 58 तक वे ‘स्वस्तिका प्रकाशन न्यास’ के सचिव रहे। 1959-60 में उन्हें चौबीस परगना विभाग का काम दिया गया। 1975 तक उन्होंने विभाग और संभाग प्रचारक की जिम्मेदारी संभाली।

1977 में माधव दा को मॉरीशस भेजा गया। 12 वर्ष वहां रहकर उन्होंने मॉरीशस तथा दक्षिण अफ्रीका में संघ कार्य की नींव मजबूत की। 1989-90 में वे छह माह तक बंगाल के सह प्रांत प्रचारक रहे। इसके बाद उन्हें विश्व हिन्दू परिषद में पूर्वांचल क्षेत्र (बंगाल, बिहार, उड़ीसा तथा असम आदि) के संगठन मंत्री की जिम्मेदारी दी गयी। 1997 में वे विश्व हिन्दू परिषद के संयुक्त मंत्री के नाते दिल्ली आ गये। इस समय उन पर विदेश विभाग का काम था।

कुछ समय बाद उन्हें केन्द्रीय मंत्री की जिम्मेदारी तथा वैश्विक समन्वय का काम दिया गया। विश्व भर में संघ तथा विश्व हिन्दू परिषद के काम के कई आयाम हैं। कार्यकर्ता भी सब ओर हैं; पर दूरी और व्यस्तता अधिक होने से भारत जैसी दैनिक शाखाएं नहीं हैं। ऐसे में दुनिया भर के काम और कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय बनाना बहुत कठिन काम था।

रात में जागकर विदेश से आने वाले कार्यकर्ताओं के फोन सुनना, उनके पत्रों के समय से उत्तर देना, भारत आने पर उनका सहयोग तथा विदेश जाने वाले कार्यकर्ताओं को उचित मार्गदर्शन दिलाना आदि काम उन्होंने दो वर्ष तक बहुत कुशलता से निभाये। इस बीच उन्हें गुर्दे का कष्ट प्रारम्भ हो गया। पहले दिल्ली और फिर मुंबई के इलाज से विशेष लाभ नहीं हुआ। अतः वे अपने भाई के पास पुणे में रहकर प्राकृतिक इलाज कराने लगे। एक अपै्रल, 2000 की प्रातः शाखा से लौटकर उनका स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया और थोड़ी ही देर में वे चल बसे।

प्रसिद्धि से सदा दूर रहने वाले माधव दा के देहांत के बाद बहुत ढूंढने पर भी उनका चित्र कहीं नहीं मिला। अंततः मॉरीशस से मंगाकर उनका एक चित्र कोलकाता कार्यालय में लगाया गया।

%d bloggers like this: