बाप मरा अंधेरे में और बेटा का नाम ‘पावर हाउस’

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दरबारी पत्रकार औऱ उसका अकबरनामा

एक बहुत पुरानी कहावत है “बाप मरा अंधेरे में लेकिन बेटा का नाम था पावर हाउस। एक दूसरा कहावत भी बहुत मशहूर है अंधे का नाम नयनसुख। आज कल कुछ ऐसे ही हालत देश दुनिया में है। जिसमें पावर हाउस तो बहुत है लेकिन अपराध भ्रष्ट्राचार, दुष्कर्म, चोरी चकारी, ब्लैकमेंलिंग, हत्या, जैसी अपराध दिनों दिन बढते ही जा रहे है। रोशनी में होने का मतलब होता है बुराईयों से दूर होने लेकिन यहाँ तो रोशनी के चकाचौंध ही मनुष्य को गर्त में ढकेलने में लगा है।

जबकि आपको समाज सेवक कहलाने वाले नेता, लोकतंत्र को चौथा स्तंभ कहने वाले मिडिया, लोकतंत्र मे मानवाधिकार को सुरक्षा करने वाली अदालतों की भरमार है और यह सब पावर हाउस है जिसमें लोकतंत्र यानि न्याय अंधेरे में मरा जा रहा है।

अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने वाले चौथा स्तंभ पत्रकारिता आज अपना नया कहानी बना लिया है। जिसमें चमक धमक और पैसे कमाने की होड़ लगी हुई है। पत्रकार के शब्द उनके कहानी, उनके द्वारा दिये जा रहे जानकारी से भ्रामक स्थिति बनती जा रही है। सता से सवाल पूछने की प्रचलन तो लगभग समाप्ति की कगाड़ पर खड़ा है। अब कलम स्टेट में दरबारी के लिए लेख लिखने लगा है। स्टेट अब मिडिया का प्रयोग अपने चुनाव प्रचार के लिए करने लगे है। अब तो सोशल मिडिया भी बहुत बड़ा रोल अदा करने लगा है। मिडिया मना करे तो सोशल मिडिया। सोशल मिडिया के पत्रकारों की कोई कमी नही है। सही पत्रकार तो चाटुकार के भीड़ में कही खो सा गया है दिन भर के थकावट के बाद उसे रात की भोजन भी नसीब नही होना एक स्टेट को अच्छा लगता हो लेकिन एक समाज के लिए यह स्थिति सही नही है। क्योंकि पत्रकार ही है तो बिना वेतन के ही पुलिस औऱ क्रिमनल से दिन रात लड़ता रहता है उसके बदले में उसे कई बार मौत के रूप में सम्मान प्राप्त होता है औऱ छोड़ जाता है अपने पीछे पूरे कहानी को।

अपने राजनीतिक पार्टियों में पत्रकार को दरबारी बनाने की होड़ लगी हुई है ताकि अकबरनामा लिखा जा सके। अकबरनामा इसलिए कह रहा हूँ कि अकबरनामा में अकबर के बुराई को भी ऐसे लिखा गया है जैसे पता नही कितने महान कार्य किये हो। पार्टियाँ भी कुछ पत्रकार अपने यहाँ रखने लगे है ताकि उनकी अकबरनामा सही से लिखा जा सके।

एक पत्रकार राजनीतिक पार्टी के दरबारी बनने के बाद एक ग्रुप बना लेता है जिसका नाम my press family ऐसे ही रखे जाते है। उसमें 250 पत्रकार को और जोड़ लिया जाता है। पत्रकार इसे अपना खुशनसीबी मान लेते है। उसके बाद पार्टी के छोटे-मोटे कार्यक्रम और कार्यकर्ता एक कंबल बाटने की कार्यक्रम रखता है जिसमें एक कंबल को 10 लोग मिलकर देते है। शायद कंबल भी शरमा जाता होगा या फिर गरीबी। उस गरीब का फोटो 10 पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ शेयर किये जाते है। माहौल ऐसे होते है जैसे कि गरीब को कंबल नही आस्कर अवार्ड दिया गया हो। ग्रुप में तो पहले से ही मिडिया वाले है ही उनका भाग दौड़ शुरू होता है पहले कौन ? सबको अपना नंबर बनाना है। इसी खेल का फायदा आजकल राजनीतिक पार्टियाँ उठाने लगे है। पूरे ग्रुप मे दो चार तो प्रकाशित कर नही देंगे। जब ऐसे ही काम चलता हो को भला पत्रकार को कौन पूछने लगा?

पत्रकार इसी उम्मीद में लगा रहता है कि चलों आने वाले होली दीवाली में नेता जी एक 500 की एड दे देंगे। लेकिन नेताजी को पहले से तैयार रहते है चल हट जा निकल ले रास्ते से पत्रकारों की कमी नही है मैने तुम्हे कहा था क्या लगाने के लिए। मेरे ग्रुप में तो तुम्हारे अलावा 249 पत्रकार और भी है। लेकिन फिर भी हम नहीं समझते अगले सुबह ही नेता जी के फोटो खीचने पहुँच जाते है। इसी कारण आज मिडिया बिल्कुल बेअसर हो चुका है। पत्रकारों के साथ हो रहे उत्पीड़न इसका एक प्रमुख कारण भी है।

पत्रकारिता में आजकल खोज नाम की चीज नही है।

पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य समाजिक गतिविधियों से अवगत कराना है ना कि स्टेट से। आज whatsap के जमाने मे कोई भी पत्रकार डाटा वेरिफाई नही करना चाहता है। जिसने भेज दिया वही उसका अंतिम सत्य है। क्योंकि अगर वेरिफाई करने लगे तो सामने वालों की नाराजगी झेलना पड़ सकता है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी अब अक्षय कुमार से इंटरव्यू करवाने लगे है। कहते है न “जो रोगी सुहाय वही वैदा फरमाये” वाला हाल हो चुका है। जो नेता जी को पसंद हो हम वही बात करेंगे, वो दिन को अगर रात कहे तो हम भी रात कहेंगे।

पत्रकार के द्वारा किए जा रहे लापरवाही का फायदा सबसे ज्यादा एनजीओ वाले उठा रहे है। 10 कंबल को 1000 कंबल छपवाकर सरकार से खुब पैसा वसूलने मे लगे है या फिर टैक्स में फायदा ले रहे है। खबर छापने वाले पत्रकार को तो ये लोग क्या क्या नही कहने लगे है। लेकिन इसके बावजूद पत्रकारों पर कोई फर्क नही लगे है राजधर्म निभाने में।

अगर आपको राजधर्म ही निभाना है तो समाजिक मुद्दों की कमी नही है। फ्रि में समाज सेवा करे। हम उनकी सेवा क्यों फ्री में करे तो सत्ता में आने के बाद पाँच साल में अपने प्रापर्टी को 500 गुणा इजाफा कर लेते है। आज विपक्ष कमजोर है तो मिडिया को स्वयं एक विपक्ष की तरह से काम करना चाहिए। जरूरी नही है कि आप स्टेट कि सिर्फ शिकायत ही करे लेकिन अगर आप सवाल नही पूछेंगे तो लोकतंत्र खत्म हो जायेंगे और आप सब अकबर के दरबार के दरबारी। इसलिए समाजिक मुद्दे उठाये। आपको सरकार पसंद है अच्छी बात है लेकिन सरकार में सभी लोग ऐसा नही है जो सरकार के मुताबिक ही काम कर रहे है। कुछ लोग सत्ता के टोपी बदलने के माहिर है उन पर नजर रखना जरूरी है। आज घऱ घर में पत्रकार है लेकिन फिर भी समाज में अंधेरा है।

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