तलाक जिंदगी के साथ भी जिंदगी के बाद भी, एक युवती कि जुबानी।

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आज समाज रहा नहीं हर कोई जिंदगी गफलत में जी रहा है। एक दूसरे के ऊपर ऐहसान है करते हुए जीने वालें लोगों की कमी नहीं रही है। एक वो लोग है भ्रम में रहते है कि वह अकेले ही जिंदगी जी लेगा, दूसरा वो लोग है जो दूसरे को आजादी के पाठ पढ़ाते रहते है। समाज की यह मानसिक बीमारी अब घर घर में गुंजने लगा है। अरब से चलकर आने वाली तलाक नामक हवा अब भारत से गलियों में गुंजायमान है। इसमें सबसे बड़ा रोल हमारा संविधान अदा कर रहा है। दो जिंदगी का मिलन कोर्ट के कागज दीवार के माध्यम से तोड़ दिये जाते है लेकिन क्या वो अपने मन, आत्मा से अलग हो पाते है। ऐसे ही एक सच्ची घटना

तलाकशुदा एक महिला ने वतन की आवाज को दिल को छू लेने वाली व्यथा सुनाई

मेंरे पति से थोड़ी कहासुनी होने के बाद मै अपने मायके चली आयी लेकिन मेरा पति भी मेरे पीछे-पीछे आये। लेकिन मेरे अंदर की घमंड और कुछ रिस्तेदारों के झुठी गवारी ने हमारी जिंदगी बर्बाद कर दिया। मेरे पति मुझे बहुत समझाया की जो हो गया सो हो गया चलों। पति पत्नी के बीच ये सब तो होते ही रहते है लेकिन मै ही उनका अपने रिस्तेदारों के बात को मानकर झुठे दहेज केस में फंसा दिया। शायद मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा भूल था जिसमें हमारे रिस्तेदारो नें पूरा पूरा साथ दिया हमारा और हमारे जिंदगी को बर्बाद हो जाने दिया।

केस झुठा था इसलिए मेरे पति को बरी कर दिये गए लेकिन मै आज भी उससे नही उबर पाया हूँ। अब 6 साल हो चुके है और मै घर पर बैठी हूँ। केस झुठे थे तो मेरे पति बरी हो गए। उनकी दोबारा से शादी हो गई। अब मै सोचती हूँ कि आखिर मै अपने पति से साथ क्यों नही गई जब वो लेने आए थे। अगर मैं अपने पति के साथ चली गयी होती तो हमारे एक दो बच्चे होते। मै भी खुश होती और मेरे पति भी। मेरी सास भी खुश होती और मेरे ससूर भी।

इस दुनिया में सभी लोग सलाह देते है साथ कोई नहीं, आखिर में जिंदगी तबाह हो जाएगी। अगर कहासुनी हो जाती है तो रिश्ते को खत्म करने से अच्छा है दो चार दिन रुठ जाए, फिर कोई मनाए और मान जाए।

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