भ्रष्टाचार समाज के मूल में

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हम लोग अक्सर यह कहने से परहेज नहीं करते की सत्ता में बैठा व्यक्ति भ्रष्ठ हो चूका है या फिर भ्रष्ठ है। लेकिन इस बात को भूल जाते है कि भ्रष्टाचार इस समाज के मूल मंत्र है और जड़ तक समाहित है।

ऐसे में एक कहावत जो कि बहुत मशहुर है:

इस जमाने में ईमानदार वही है जिसे मौका नही मिला है। वरना सभी अपने-अपने हिस्से की भ्रष्टाचार करने में लगे है। भ्रष्टाचार हमारा नैतिक कर्तव्य और माँगना हमारा मौलिक अधिकार है। देना हमें किसी ने आज तक सिखाया ही नही है।
वो तो मजबूरी है, कि हम किसी को कुछ दे देते है।

कोरोना काल में सभी लोग घर में था उस समय में कवरेज के लिए निकला। एक जगह में एक और महाशय थे। हम दोनो घुमते-घुमते सेक्टर 33 महाराजा अग्रसेन भवन पहुचे। वहाँ पर लोगों के लिए भोजन की प्रबंध किया गया था। वो कीचन लगे थे। एक अग्रवाल मित्रमंडल के द्वारा और दूसरा मोदी रसोई।

यहाँ पर से खबर लेकर निकला, स्कूटीके पास पहुँचा तो स्कूटी के टायर पंचर हो चुके था। दोनो महाशय मिलकर स्कूटी को धक्का लगाना शुरू किया और पास के पैट्रोल पंप पर पहुँचा तो वहाँ कोई भी हवा भरने वाला या पंचर बनाने वाला नही था। वहाँ से आगे की तरफ निकला।आधा एक घंटा के मशक्कत के बाद अगले पैट्रोल पंप पर पहुँचा तो वहाँ पर पंचर बनाने वाले दो लड़के मौजूद थे। उसने पहले नलकी यानि की हवा डालने वाले नोजल को खराब बता दिया। तो हमने कहा कि बदल दो शायद यही खराब हो गई होगी। उसने नलकी को काट नलकी लगाते हुए एक तेज सुए का प्रयोग किया। टायर हो सकता है कि पहले पंचर रहा हो क्योकि गाड़ी खड़ा करने के काफी देर बाद हवा निकला था। लेकिन एक पंचर हो ऐसा हो सकता था। लेकिन उसने पंचर कर दिया। यानि दो पंचर उस तेज सुए के माध्यम से। मैने कहा चल बना दे।

उसने तीन पंचर और एक नलकी लगा दी। मैने उसे 500 की नोट दिया। उसने 350 रूपये काटकर 150 रूपये लौटा दिया हमने उससे पूछा भाई इतना? तो उसने बताया कि 200 रूपये नलकी की और 150रूपये पंचर की हमने कहाँ एक तो दो पंचर तूने किया है। दूसरा पचास रूपये नलकी के 200 रूपये हमे लिया। पहले तो बहुत झिक-झिक किया फिर बाद मे उसका नजर शायद गाड़ी पर लिया प्रेस पर पड़ गया-

फिर थोड़ा सा वो ठिठक गया, फिर हंसते हुए बोला चलो सर 100 रुपये दे दो। उसने 100 रुपये लाकर मेरे हाथ मे दे दिया। फिर मैने उसे बोल यह तो 50 रुपये मे लगाये जाते है । तुम 100 रुपये क्यों ले रहे हो ?

अब उसने बोला दिल्ली से समान आ नही रहे है महंगा हो गया है। यह सब मेरे साथी पत्रकार देखता रहा लेकिन एक बार भी उसका जुबान नही खुला। बाद मे जब यह बात हमने बोला की चलों हमने दे दिया ऐसा कोई व्यक्ति जो पहले से ही जरूरतमंद हो और अगर उसका गाड़ी पंचर हो जाये तो ये लोग उसके खाल ही खीच लेंगे। तो हमारे साथ गये पत्रकार महोदय को कोई भी जुर्म नजर नही आया उसमे उसे कोई गलती नही मिला।

पहले तो उस पंचर वाले ने एक पंचर को तीन पंचर बना दिया। दूसरा नलकी लगाने की कोई जरूरत नही थी। लेकिन उसने उसे भी खराब बताकर 200 रूपये को बेचना चाहा। यानि 50 रुपये की चीज को 200 मे।

अब बात यह है कि किस प्रकार से एक पंचर वाले तक में भ्रष्ट्राचार भरा हुआ है। लुटने मे कोई कसर नही छोड़ रहा है। अगर यही लोग एक दिन नेता बन गया तो देश का क्या होगा। इसलिए ये कहना गलत नही होगा की भ्रष्ट्राचार भारत के मूल मे समाहित हो चुका है।

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