चिता की आग ठंडी नही होने दे रही है , कोरोना की कहर

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सोशल मिडिया पर लगातार तस्वीरे वायरल किया जा रहा है। जिसमें बताया जा रहा है कि शव दाह के लिए लोगों को लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। वही कई जगह से घाटों की तस्वीर सोशल मिडिया पर वायरल हो रहे है। जिसमें शवों का कतार दिखाई दे रहा है। जिस काशी में मोक्ष प्राप्ति करने पर परिजन गौरवान्वित हुआ करते थे अब उस तस्वीर को देख भय खाने लगे है।

देश में कोरोना संक्रमण से मरने वालों का आकड़ा लगातार बढता जा रहा है। उससे शवदाह गृहों में अंतिम संस्कार के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। वही कई शहरों से शमशान की भट्टियाँ पिघलने की खबर भी आ रही है। इसके साथ ही रातों में भी चिता जलाने की खबरे मिल रही है।

काशी के महाशमशान जहाँ पर मृत्यु उत्सव की तरह दिखती थी लेकिन वहाँ आज दहशत है। जीवन के अंतिम सत्य भी यही है लेकिन फिर भी अंतिम सत्य को बखानने वाले आज एक पल ही रूकने को तैयार नही। घाट पर जगह जगह पड़े शव को देख लोगों के रोंगटे खड़े होने लगे है।

मिडिया और सोशल मिडिया पर लगातार एक मातम का माहौल है। टीवी एंकर चिल्ला-चिल्ला कर बता रहे है कि देखिये देश की क्या हालत है। एक कारण यह भी है मृत्यु दर बढ़ने की। क्योंकि जितने लोग रोग से नही उससे ज्यादा लोग टीवी और सोशल मिडिया के प्रयोग से जान गवा रहे है। सोशल मिडिया और मिडिया लोगों को जागरूक करने के बजाय लोगों के मानसिक स्थित को खराब करने की काम कर रहे है।

चलिए ऐसे समझते है: आप पहले भी किसी शमशान घाट में अगर गए है तो बताईये क्या पहले आपको इंतजार नही करना पड़ता था। पहले भी करना पड़ता था तो आज भी करना पड़ रहा है। पहले फर्क ये था कि आप अपने हिसाब से दाह संस्कार में भाग लेते थे। अपने समय के अनुसार सबकुछ की व्यवस्था करने के बाद पहुँचते थे। उसके बाद दाह संस्कार होता था लेकिन आज सीधे अस्पताल से शमशान में पहुँचाया जा रहा है।

शमशान में भी प्रोटोकाल लागु है। उससे ज्यादा शव अन्दर नही रखी जा सकती है। जबकि पहले कई कई शव थोड़े-थोड़े दूर पर रखे मिल जाते थे। अब जब शव को अन्दर ले जाने की इजाजत नही है जब तक की खाली न हो जाय। तो बताईये सड़क पर ही तो एम्बुलेंस खड़ा होगा जिसकों देखकर बड़ी बड़ी खबरे बनायी जा रही है।

हर कोई शमशान की खबर दिखा रहा है अरे भाई कोई कब्रिस्तान का भी खबर दिखा दो। मै यह नही कह रहा हूँ कि मुसलमानों के साथ गलत हो लेकिन अंदाजा तो लगाया जा सकता है कि वहाँ कि हालात क्या है, या सिर्फ हिंदू ही कोरोना के शिकार है। देश के किसी भी हिस्से से कब्रिस्तान की खबर नही है। एक तरफ अगर भट्टियाँ पिघल रही है तो दूसरी तरफ भी तो जमीन कम पड़ने की शिकायत आनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नही है।

पहले तो विपक्ष कोरोना का विरोध करना था लेकिन इस बार तो विपक्ष को भी यकीन हो गया है कि कोरोना है। पक्ष, विपक्ष और मिडिया तीनों मिलकर जनता को गुमराह करने की काम कर रहा है। एक तरफ जहाँ कोरोना की मरीज बढ़ा है वही दूसरी तरफ गलियों में चलने वाले चेरिटिबल सालों से बंद है। कई अस्पताल को ओपीडी बंद है। तो क्या सारे बिमारी कोरोना के डर से गायब हो गया । आखिर कहाँ गये वो मरीज जिसके लंबे लाईन लगने की खबर अखबार के हैंडिंग बना करता था। ठीक से ईलाज नही होने पर डाक्टर के साथ मार-पीट किये जाते थे।

कोरोना से सारे बीमारी डरा लेकिन कोरोना चुनाव से डर गया।

कोरोना के बीच लगातार चुनाव हो रहे है। कोरोना भी इंतजार में है कि कब चुनाव खत्म हो और उस राज्य में प्रवेश करे। क्योंकि चुनाव में बटे रसगुल्ले और दारू का मजा जो लोगो नें लिया है

पढ़े लिखे समाज में जागरुकता की कमी है। वो इसके बचाव से ज्यादा इसके दहशत में है। लगातार घर में भी मास्क लगाकर सो रहे है। नोटो को सेनेटाईजर से धो रहे है। वही किसी भी शहर के मध्यमवर्गीय या गरीब मलिन बस्ती में जाइये वहाँ लोगों को कोरोना की चिंता नही है वहाँ लोगों को रोजी रोटी की चिंता है। एक आकड़े के अनुसार या लगातार प्राप्त हो रहे खबरों के अनुसार कोरोना का प्रकोप उच्च कोटी के समझे जाने वाले सोसायटी में ज्यादा है।

क्यों पड़ते है आक्सीजन की जरूरत।

हम सभी लोग जानते है कि मनुष्य या संसार किसी भी प्राणी के लिए वायु कितनी आवश्यक है। अब जब मास्क लगाया जायेगा तो निश्चित तौर पर सांस पूरा नही होगा। जिसके कारण बल्ड प्रेशर, डिप्रेशन ,टेंसन जैसे अनेक रोग उत्पन्न हो रहे है। अगर मास्क से नाक और मुंह दोनो बंद है तो सांस कहाँ से ले ? अगर सांस ले लिया तो उसे छोड़े कैसे ? अस्पताल में आक्सीजन की सिलेंडर लगाये जा रहे है लेकिन खुलकर सांस लेने की इजाजत नही है।

हम कुछ ऐसे भी समझ सकते है। एक आफिस है जिसमें A/C लगी हुयी है। निश्चित तौर पर अगर A/C लगी है तो उसे चारों तरफ से बिल्कुल बंद किया गया होगा। ऐसे में वहाँ पर लोगों को पहले से ही घुटन की शिकायत होते है और उसमें भी अगर उसनें मास्क लगा लिया तो क्या सांस ले पायेगा। निश्चित तौर पर नही। फिर अगर जिसके सांस को 8 घटे रोके जा रहे हो उसका क्या हालत होगा। लेकिन तथाकथित समझदार लोग अपने स्टाफ को आफिस में पूरे समय तक मास्क लगाने के लिए मजबूर कर रहे है। अब नौकरी करनी है तो चाहे जान पर खेलकर करे , करना तो होगा। यही कारण है कि अगर ऐसे लोगो पोजिटिव आते है तो झेल नही पाते है।

जीवन मंत्र है

कोरोना में जागरुक होना चाहिए। लोगों को जागरुक करना चाहिए। सोशल डिस्टेंस मेंटेंन करना चाहिए। जब दो लोग बात करे तो मास्क होनी चाहिए। हाथ ज्यादा से ज्यादा धोने चाहिए। सेनेटाइजर का इस्तेमाल कम से कम करे। सबसे बड़ी बात चिंता बिल्कुल मत करें। अफवाह फैलाने वाले समाचार पत्र और मिडिया नेता से दूर रहे।

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