चीनी मोबाइल कंपनी का नये खेल, भारत मे मैन्युफैक्चरिंग के बजाय चाइना से माँगा रही है फ़ोन.

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भारतीय मार्किट मे कोरोना के बाद काफी ज्यादा काम ऑनलाइन हो चूका है, और अब मोबाइल और लैपटॉप की डिमांड बढ़ गयी है. ऐसे मे chines कंपनी भारत मे मैन्युफैक्चरिंग  बढ़ाने के बजाय चाइना से आयत करके के बेचने की कोशिश कर रही है या करेंगी. अगर ऐसा हुआ तो भारत के जीडीपी के साथ साथ रोजगार पर भी असर पड़ेगा.

आपको बता दे की कोरोना के कारण लॉक डाउन किया गया निसमे बड़ी संख्या कर्मचारी नोएडा और दिल्ली जैसे शहरों से पलायन कर चुके है. इसी बीच मे प्रशाशन ने ओप्पो, वीवो और शाओमी जैसी chines मोबाइल कंपनी के प्रोडक्शन यूनिट को प्रोडक्शन की अनुमति दे दी है. अब उनका बहाना है की हमारे पास मैनपावर की कमी है जिसके कारण हम डिमांड को पूरा नही कर पा रहे है. सोशल डिस्टन्सिंग के कारण भी उनको समस्याओं का सामना करना पर रहा है.

यहाँ बताना जरुरी है की भारत सरकार इम्पोर्ट ड्यूटी पहले ही बढ़ा दी है लेकिन फिर भी ये कंपनी chines माल सप्लाई करने के जुगाड़ के लगी है. हो सकता है इनका chines बोस ने ऐसा करने को कहा हो. क्यूंकि कोरोना के बाद सभी देश ने चाइना को बैन कर दिया है. चाइना के अर्थ व्यवस्था घुटने टेक रही है. ऐसे मे उनके पास एक रास्ता है की भारत के रास्ते अपना व्यापार करें.

अब एक बात और जो सोचने वाली है की भारत मे लोगों के कारोबार बंद है. नौकरी तेजी से जा रही है ऐसे मे डिमांड कैसे बढ़ती जा रही है. जाहिर है की ये कंपनी मेक इन india के बजाय मेड इन चाइना बेचने की कोशिश मे है. अगर ऐसा होता है तो मेक india और लोकल फॉर वोकल को भी आघात लग सकती है. साथ ही लोगों के रोजगार पर भी फर्क पड़ेंगे. फिर कुछ संगठन और पॉलिटिशियन रोजगार रोजगार की रोटी और चटनी बाटेंगे गरीब और मजदूरों को.

एक तरफ कई संगठन chines माल को लेकर विरोध जाता रही है दूसरी तरफ chines माल की डिमांड बढ़ना कही ना कही भारतियों के देश भक्ति पर भी सवालियां निशान लगा रही  है. जब पुरे दुनिया मे कोरोना फैलाने को लेकर चाइना अलग थलग है. पिछले एक महीने से भारतीय सेना ड्रैगन सेना के सामने युद्ध के लिए खड़ा है. ऐसे मे जनता की हमदर्दी और ये कैसा देश भक्ति है. क्या भारत के लोग सिर्फ वन्दे मातरम तक ही अपने सोच को सिमित कर लिया है.  कंपनी किसी के भी हो लेकिन मेक  इन इंडिया  होनी चाहिये.  हमें जापान जैसे देशो से कुछ सीखना चाहिये.

रमन कुमार झा

संपादक राष्ट्रप्रेम हिन्दी

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