सस्ते दरों पर उपलब्ध आईटी/आईटीज स्पेस के उपयोग की जांच किसकी जिम्मेदारी : राईज

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नोएडा ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे तीनों प्राधिकरण के तहत बड़ी पैमाने पर आईटी/आईटीज के लिए उपलब्ध कराये गये थे जमीन। क्या इसका प्रयोग आईटी/आईटीज के लिए किये जा रहे है या फिर इस पर बने आफिस को किसी और व्यवसाय के लिए दिया जा रहा है। जैसा कि शहर के एक प्रतिष्ठित अखबार मे विज्ञापन के जरिये निवेशकों को आमंत्रण दिया गया है। सस्ती दर पर दिये गये जमीन का दुरुपयोंग कर बड़े पैमाने की लूट की जा रही है और प्राधिकरण के अफसर और संबंधित डिपार्टमेंट चुप बैठै है आखिर क्यों ?

तीनों प्राधिकरण के तहत बड़े पैमाने पर आईटी/आईटीज हब बनाने के लिए भूमि आवंटन किये गये है। यह लगभग 2002 से लेकर 2011 तक की मामला है। इन्फारमेशन टेक्नोंलाजी को बढाबा देने और इससे जुड़े लोगों को रोजगार देने हेतू बड़ पैमाने पर इस सेक्टर का निर्माण करने की योजना बनायी गयी थी। लेकिन बड़े पैमाने पर इस स्पेस का प्रयोग दुसरे कार्यों के लिए किये जा रहे है। जैसा की विज्ञापन मे दिया गया है।

राईज( RIGHT INITIATIVE FOR SOCIAL EMPOWERMENT) ने विगत 10 वर्षो मे कई गंभीर सवाल उठाये है लेकिन अधिकारी. नोकरशाही और राजनेता तीनों इस मुद्दे पर चुप है। अब सवाल यह उठता है कि तीनों चुप क्यों है ? इससे पहले ग्रेटर की मामला जहाँ पर औद्योगिक भूमि को आवासीय मे बदल दिया गया और लाखो निवेशक अपने जीवन भर की कमाई उसमे लगाकर दर-दर की ठोकरेे खा रहे है। क्योंकि ये बदलाव नियम के विरूद्ध था। जिस पर धीरे-धीरे शिकंजा कसने की तैयारी है। हालाँकि बड़ी मछली अभी भी पकड़ से बाहर है या उसके लिए जाल ही नही बिछाया जा रहा है।

आईटी और आईटीज के लिए दिये गये भूमि जो की बहुत ही सस्ते दर पर दिया गया है। जिसके लिए 5 साल के अन्दर कन्स्ट्रक्शन कर लेने पर स्टाम्प डयूटी मे छूट का प्रावधान भी शामिल है। जमीन का आवंटन लगभग 2005 से 2010 के बीच मेे किया गया था। इस हिसाब से अगर इस पर निर्माण कार्य पूरा नही किया गया है तो स्टाम्प शुल्क लगना चाहिये। जिससे बड़े राजस्व की प्राप्ति नोएडा और ग्रेटर प्राधिकरण को हो सकते है।

दूसरी बात है कि इस जमीन को बेहद ही सस्ती दरों पर आवंटित किया गया था। इसका उद्देश्य आईटी सेक्टर सस्ती मे जगह देकर आउटसोर्सिंग कार्यो मे बढ़ोतरी कर रोजगार बढाना था। लेकिन अगर इस भूमि को आफिस के लिए प्रयोग किया जा रहा है या दिया जा रहा है तो नियम के विरूद्ध है और सरकार को धोखा दिया जा रहा है। पिछले 15 वर्षों में हमारी टिप्पणियों के अनुसार, रियल्टी क्षेत्र के निवेशकों को जी.बी के डेवलपर्स द्वारा लूटा गया और धोखा दिया गया। नगर। हाउसिंग प्रोजेक्ट्स में, अधिकारियों की नौकरशाही और राजनेताओं की सांठगांठ के कारण गलत भूमि नीति और अनियमितताओं के गलत / अनुचित आवंटन के कारण उन्हें कब्जा नहीं मिला। इस को जांच करने की जिम्मेदारी किसकी है ?

यूपी इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन लिमिटेड के प्रबंध निदेशक ने गौतम बुद्ध नगर के तीनो प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों को 24.01.2020 को एक पत्र लिखा और इस मामले पर स्पष्टीकरण देने को कहा। लेकिन अभी तक इस पर कोई कारवाई नही की गयी है।

श्री अनिल के गर्ग ने रेरा उत्तर प्रदेश, यूपी इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन लिमिटेड के प्रबंध निदेशक और अपर मुख्य सचिव, आईटी और इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग उत्तर प्रदेश को लिखे खुले पत्र अधिकारियों के कार्यशैली पर कई सवाल उठाये है। साथ ही उन्होने डेवलपर्स के द्वारा निवेशकों से एश्योर्ड रिटर्न बेसिस पर ग्राहको को आकर्षित करने और उससे धन इकट्ठा करने को लेकर भी सवाल उठाये है। यह नाॅन बैंकिग फाईनेन्स स्कीम जैसी है लेकिन RBI और SEBI इस पर चुप है।

श्री गर्ग का कहना है कि हमने इस मामले मे सभी संबंधित अधिकारियों और प्राधिकरण को समय समय पर ध्यान आकर्षण किया है लेकिन सभी चुप है यह जानते हुए कि निवेश को मोड आफ आपरेंडी का ज्ञान नही है और बड़े पैमाने पर उनसे निवेश करवाया जा रहा है।

अब यह तीनो विकास प्राधिकरणों की जिम्मेदारी है आईटी के लिए दी गयी जमीन की निगरानी करे, निवेशकों को जो आफिस स्पेस दिये जा रहे है वोे आईटी के लिए है या किसी और काम के लिए। अगर आफिस स्पेस किसी और काम के लिए बेचे जा रहे है तो एक बहुत बड़ा घोटाला है। क्योंकि यह सस्ते दर पर सिर्फ आईटी के लिए दिये गये है। क्या प्राधिकरण के अधिकारी कभी यहाँ जाकर जाँच करते है कि वास्तविक मे जिन्हे स्पेस बेचा गया है और जो प्रयोग मे ला रहे है उनका पेशा क्या है ।

सभी आईटी / आईटीएस बिग लैंड अलॉटमेंट्स की पहचान, निगरानी, ​​चेकिंग की आवश्यकता है @ बहुत रियायती दरों पर और स्टाम्प ड्यूटी से भी छूट दी गई, क्यों? सबसे महत्वपूर्ण इस मामले में, चूंकि स्टांप ड्यूटी में छूट कुछ शर्तों के साथ थी, इसलिए अब यह उत्तर प्रदेश के स्टाम्प और पंजीकरण विभागों की एक जिम्मेदारी है कि वे IT / ITes की थोक भूमि की आवंटन शर्तों की जांच और निगरानी करें और तदनुसार आवंटन की जांच करे और उनसे स्टाम्प डयूटी वसूले। पहले भी बिल्डरों को दिये गये अतिरिक्त एफएआर के 500 करोड़ रुपये की स्टाम्प डयूटी के मामले मे निष्क्रिय है।


अब RERA U.P के हस्तक्षेप की जरूरत इस मामले में पहले से ज्यादा है। इसमे सबसे बड़ी लापरवाही प्लानिंग डिपार्टमेंट और फाईनेंस की है। आखिर भ्रामक और गुमराह करने वाली विज्ञापन पर स्पष्टीकरण क्यों नही लिया गया जैसा की शहर के प्रमुख अखबार मे विज्ञापन प्रकाशित किये गये है। आखिर क्यों नही 3 लाख से अधिक निवेशकों के घर दिये गये। दूसरी सबसे अहम बात बिल्डर को दिये गये अतिरिक्त एफएआऱ पर अभी तक स्टाम्प ड्यूटी क्यों नही लिया गया ? जो कि अनुमानित 500 करोड़ की है। अगर आईटी वाली भूमि भी अगर अपने शर्त को पूरा नही किया है तो इस भी स्टाम्प लगना चाहिए। तीसरी सबसे अहम बात कई लोगों को आर सी रेरा के द्वारा काटे गये है लेकिन उनका पैसा उनको वापस नही दिया गया है। भ्रामक और गुमराह करने वाली विज्ञापने देकर निवेशको से पैसे लिये गये है तो इस पर भी निगरानी किये जाने चाहिए।

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