उपचुनाव में हार के बाद गंभीर हुई भाजपा, अब चार सीटों पर होने हैं By-polls

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पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव में अपेक्षा के अनुरूप सफलता ना मिलने के बाद से भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व सजग और सतर्क हो गया है.

मध्यप्रदेश में दमोह विधानसभा के उपचुनाव में हार के बाद भाजपा अब तीन विधानसभा और एक लोकसभा क्षेत्र के उपचुनाव को लेकर गंभीर है. यही कारण है कि पार्टी में अभी से मंथन का दौर शुरू हो गया है. साथ ही जमीनी फीडबैक भी जुटाया जा रहा है. पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव में अपेक्षा के अनुरूप सफलता ना मिलने के बाद से भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व सजग और सतर्क हो गया है और उसने आगामी समय में जिन राज्यों में चुनाव होने हैं, उन पर अपनी पैनी नजर रखना शुरू कर दिया है.

जिन राज्यों में उपचुनाव है उसके लिए भी कदमताल तेज कर दी गई है. ऐसे ही राज्यों में शामिल है मध्यप्रदेश, जहां लगभग ढाई साल बाद विधानसभा चुनाव होना है. उससे पहले तीन विधानसभा क्षेत्र बुंदेलखंड के पृथ्वीपुर, विंध्य क्षेत्र के रैगांव और निमाड़-मालवा के जोबट के अलावा खंडवा लोकसभा क्षेत्र में उपचुनाव होना है. इनमे से दो विधानसभा कांग्रेस जोबट व पृथ्वीपुर से कांग्रेस विधायक रहे है, जबकि रैगांव विधानसभा व खंडवा लोकसभा पर भाजपा का कब्जा था. इन चुनावों के नतीजे अगले विधानसभा चुनाव के लिए बड़ा संदेश देने वाले होंगे.

भाजपा की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पार्टी के राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री शिव प्रकाश ने राज्य की सियासत पर अपनी नजर रखना शुरू कर दिया है. वे सत्ता और संगठन की नब्ज को टटोलने में लग गए हैं. उन्होंने भोपाल प्रवास के दौरान भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठकें की साथ ही कोरोना के दौरान किए गए काम और उपचुनाव में मिली पराजय के कारणों को भी जाना. वे अपने इस प्रवास के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोगों से भी मिले.

राजनीतिक विश्लेषक साजी थामस का मानना है, ‘राज्य में भाजपा को वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था, मगर कांग्रेस में हुई बगावत के कारण भाजपा की सत्ता में वापसी हुई है. फिर 28 विधानसभा क्षेत्रों के उपचुनाव में भाजपा 19 स्थानों पर जीती. इसके बाद दमोह विधानसभा के उपचुनाव में हार का सामना करना पड़ा. कुल मिलाकर भाजपा के लिए दमोह उपचुनाव के नतीजे बड़ा संदेश दे गए. यही कारण है कि संगठन भी सजग हुआ है.’

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राज्य के संगठन की जिम्मेदारी राष्टीय नेतृत्व ने लगभग डेढ साल पहले युवा सांसद विष्णु दत्त शर्मा को सौंपी. उसके बाद प्रदेषाध्यक्ष द्वारा मठाधीशों के बजाय पार्टी में युवाओं को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी तो कई वरिष्ठ नेताओं में अपने भविष्य को लेकर संशय पैदा हो गया. उसके बाद से ही कई नेता संगठन को सहयोग नहीं कर रहे है. यही कारण है कि कई बार तो ऐसा नजर आता है जैसे भाजपा के कई नेता कांग्रेस के नेताओं से नूराकुश्ती कर रहे हों या उनके साथ ही खड़े हों. (IANS)

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