थे बचपन के दिन होते कितने सुहाने अब भी याद आते हैं किस्से पुराने

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थे बचपन के दिन होते कितने सुहाने
अब भी याद आते हैं किस्से पुराने

वह बारिश के मौसम में छम छम नहाना
नांव कागज की बनाते फिर उसको चलाना
न होती फिक्र थी किसी भी समय की
याद है मुझको अब भी पुराना याराना।।

चाहे होती ईद या चाहे होती होली
घर घर पहुंचते थे बनाकर के टोली
वह गुझिया का खाना वह खाना सेवईयां
वह गुड़ की जलेबी वह घर की मिठाइयां।।

फिर वही गुल्ली डंडा वहीं बैट बल्ला
मिल टोली के संग में मचाते थे हल्ला
लुका छिपी होती फिर होती कबड्डी
हरकतों से परेशान था सब मोहल्ला।।

न पैसे की चिंता न गरीबी का ग़म था
था सबसे प्यार और सबसे अपनापन था
याद आता है सुबह सुबह पड़ता था नहाना
वह स्कूल में किया हुआ सारा बहाना।।

कभी पेट दर्द का करते बहाना
कभी बोलते थे बुखार का आना
कभी साईकिल भी हो जाती थी पंचर
फिर भी होती पिटाई करें कितना बहाना।।

नवरात्रि के आते ही जब लगता मेला
मेले में जाता ना कोई अकेला
भले होती जेब में अठन्नी चमन्नी
फिर भी शौक से चले जाते थे मेला ।।

भले मिलती थी घर पर चूल्हे की रोटी
सुबह शाम जलती थी पूजा की ज्योति
भले होते थे घर सबके कच्चे
पर झूठे नहीं होते थे रिश्ते सच्चे।।

वह राधा सा प्यार यशोदा सी ममता
नहीं मिलती हैं आज कल पत्नी सीता
कितना बदल गया है अपना जमाना
आजकल हर कोई है मुन्नी शीला का दीवाना।।

ऐसा ही था मेरे बचपन का जमाना
छोटी-छोटी बातों पर रूठना मनाना
आंखों में आसूं ले कहता है ‘गौरव’
काश! लौट आए वह बचपन पुराना।।
गौरव द्विवेदी ‘गर्ग’

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