असली ज्ञानी

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    असली ज्ञानी 

    मिस्र के प्रख्यात विचारक अनस्तेशियम के आश्रम मे पुस्तको का विशाल सग्रंह था । उस सग्रह मे अनेक , प्राचीन, दुर्लव और मुल्यवान ग्रंथ भी थे । एक बार उसके आश्रम मे आए एक सन्यासी ने उनका एक अमुल्यं ग्रंथ चिरा लिया और अपने गतव्य को चला गया । इस बारे मे अनंस्तेशियस को तुरंत पता चल गया । यदि वे चाहते तो अपने शिष्यो को उस सन्यासी के पिछे भेज कर वह ग्रंथ पाप्त कर सकते थे । लेकिन उनहे डर था कि वह सन्यासी चोरी करने के बाद अब झुठ बोलने का एक अन्य पाप कर सकता है , इसलिए उन्होने ऐसा नही किया ।
    कुछ दिनो बाद एक घनी व्यक्ति वही ग्रंथ लेकर अनस्तेशियस के आश्रम मे पहुचा और कहा , “ मुझे दुर्लभ ग्रंथ इकटठे करने का शौक है । आप इसके मर्मज्ञ हैं। एक सन्यासी इस ग्रंथ के लिए काफी मोटी रकम मांग रहा था । बताइए , क्या करुं ? “
    अनस्तेशियस ने अपनी पुस्तक पहचान ली थी । उन्होने कहा, “ यह ग्रंथ अमुल्य है । आप इसे किसी भी मुल्य पर खरिद सकते है ।“
    धनी व्यक्ति ने वापस लौटकर उस संन्यासी से कहा ,”मै मुंहमागी किमत पर यह ग्रंथ खरिदने के लिए त्यार हुं । “ फिर बातो बातो मे उसने ग्रंथ के बारे मे अनस्तेशियस से सलाह कि बात भी उसे बता दी

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    यह सब सुनकर वह सन्यांसी दंग रह गया । आज तक उसकी भलाई के बारे मे किसी ने भी इतना नही सोचा था और न ही उसके साथ इतना प्यार भरा व्यवहार किया था । उसने धनी व्यक्ति व्दारा दुगुनी किमत दोने का लालच ठुकरा कर ग्रंथ को वापस ले लिया । वह मन ही मन एक निर्णय कर चुका था सन्यासी सीधे अनस्तेशियस के आश्रम मे पहुचा और आंसु भरी आंखो से उसने उस ग्रंथ तो लोटाना चाहा इस पर अनस्तेशियस ने कहा , “ रख लो सायद तुमहे इसकी जरुरत है ।
    संन्यासी ने कहा ,” मै यह ग्रंथ लोटाना चाहता हुं और यही रख कर आपसे ज्ञान की पाप्ती करना चाहता हं। । “ अनस्तेशियस ने सन्यासी को अपने आश्रम मे रख लिया अनस्तेशियस के मधुर और प्रेमपुर्ण व्यवहार से सन्यासी का जीवन सुधर गया ।असली ज्ञानी वही होते है जो किसी को कोई चोट पहुचाए बिना उसे सन्मार्ग पर ले आते है।