और कितना इंतजार करे घऱ खरीदार ?

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नोएडा, ग्रेटर नोएडा और ग्रेटर नोएडा वेस्ट मे लाखों घर खरीदार है। जहाँ एक तरफ घर पाने की मुरीद लिए दर-दर भटक रहे है, वही 42 हजार से ज्यादा घर खरीदार अपने घर का मालिकाना हक पाने के लिए तरस रहे है। घर खरीदार पिछले पाँच साल से इंतजार कर रहे है, लेकिन उनके इंतजार की घडी खत्म होने का नाम ही नही ले रहा है।

नोएडा प्राधिकरण के बोर्ड बैठक में जो रजिस्ट्री से संबंधित प्रस्ताव रखा जाना था, लेकिन नही रखा गया। ऐसे में अब अगले महीने तक सुप्रिम कोर्ट के आने वाले फैसले का इंतजार करना पडेगा। फिर कोर्ट ही तो है अगले महीने से अगले महीने भी हो सकते है। तारीख पर तारीख से न्याय मिलेगा इसकों कौन जानता है । फिलहाल फ्लैट खरीदारों के हित में है कि इंतजार करें और अपने दिमाग के बंद दरबाजे से बिल्डर. सरकार और प्रशासन के पूरा खेल देखे। क्योंकि “योगी सरकार के भी साल हुए चार” । इसके बाद भी घर खरीदारों को है इंतजार।।

नोएडा में लगभग 17 हजार और ग्रेटर नोएडा में 25 हजार से ज्यादा फ्लैट बायर्स है जिनकी रजिस्ट्री अटकी हुई है। कारण है बिल्डरों नें प्राधिकरण को जमीन का बकाया राशी का भुगतान नही किया है। इनमें से कुछ ऐसे फ्लैट भी है जिनका काम पूरा नही किया गया है इसलिए उनको अभी उपयोग के लिए अधिभोग प्रमाण पत्र नही दिया गया है।

मार्च में यूपी के मुख्य सचिव का नोएडा दौरे के समय में बिल्डर, खरीदार और तीनों प्राधिकरण के बीच बैठक किया गया । जिसमें सुप्रिम कोर्ट से पुनर्विचार याचिका पर सुप्रिम कोर्टे के फैसला आने से पहले बिल्डर से शपथ पत्र लिये जाने पर सहमति बनी। जिसमें सुप्रिम कोर्ट के जुलाई 2020 के आदेश के तहत एमसीएलआर (मार्जिनल कोस्ट आफ फंड बेस्ड लेंडिंग रेट) के हिसाब से बकाया देने के लिए कहा जाना था।

इसके साथ ही तय किया गया कि इस प्रस्ताव को बोर्ड बैठक में ऱखकर मंजूरी दी जाए ताकि जल्दी से जल्दी रजिस्ट्री शुरु हो और लोगों को फायदा मिले। फ्लैट खरीदारों में इसके बाद एक उम्मीद जग उठी थी। लेकिन 25 जुन को हुए बोर्ड बैठक में इसको नही रखा गया। इससे घर खरीदारों में भारी निराशा है।

सरकार को राजस्व चाहिए, लेकिन घर खरीदार से

निश्चित तौर पर महामारी के समय में रियल स्टेट की बिक्री पर बहुत असर हुआ है। ऐसे में सरकार को भी राजस्व कम मिला है। अब सरकार को ज्यादा से ज्यादा राजस्व चाहिए। इसलिए सरकार के मंत्री तथा मुख्य सचिव स्वयं आकर बैठक कर रहे है। लेकिन सवाल उठता है कि सिर्फ रजिस्ट्री से ही राजस्व प्राप्त करना क्यों चाहते है। आखिर घर खरीदारों पर भी तो कोरोना की दोहरी मार पड़ी है।

नोएडा ग्रेटर नोएडा में बड़े पैमाने पर बिल्डर को एफएआऱ सेल किया गया है। जिसके लिए 2015 मे एक बैठक किया गया और प्राधिकरण के प्लानिंग और फाइनेंस विभाग को इसकी जानकारी स्टाम्प विभाग को देने के लिए आदेशित। 2015 से 2020 तक कई बार इसके लिए पत्रावली किया गया और स्वयं स्टाम्प विभाग के एआईजी संपर्क कर एफएआऱ की जानकारी देने के लिए कहा। लेकिन आज तक अतिरिक्त एफएआऱ की जानकारी स्टाम्प विभाग को नही दिया गया। एआईजी स्टाम्प ने विशाल इंडिया पत्रकार से बात करते हुए इस बात की जानकारी दी थी कि नोएडा प्राधिकरण से 12 करोड़ की स्टाम्प की जानकारी साझा की गई है लेकिन ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण से अभी तक शुन्य है।

बताया जा रहा है कि अगर एफएआर की जानकारी मिल जाय तो सरकार को लगभग 1 हजार करोड़ की स्टाम्प ड्यूटी मिल सकता है। लेकिन प्राधिकरण के प्लानिंग विभाग इसे जानबुझकर साझा नही किया है या करने में असमर्थ है। जिसके कारण सरकार को हजारों करोड़ के चुना लगा है, या कहे तो स्टाम्प चोरी किया गया है।

ऐसें में अपने खुन पसीने की कमाई बिल्डर के जेब में डालकर घर खरीदार मारा-मारा फिर रहा है वही बिल्डर और राजनीतिक सांठ-गाठ से सारा मलाई खाया जा रहा है। आखिर सरकार और सरकार में शामिल लोग बिल्डर से 1 हजार करोड़ की स्टाम्प डयूटी वसूलने में दिलचस्पी क्यों नही दिखा रहे है। कई अखबारों में अलग-अलग अनुमान है, किसी नें 5 करोड़ तो किसी ने 1 हजार करोड़ की स्टाम्प घोटाला होने की अनुमान लगाये है।

नोएडा शहर के वरिष्ठ नागरिक व अधिवक्ता श्री अनिल के गर्ग (RISE) RIGHT INITIATIVE FOR SOCIAL EMPOWERMENT)  2015 से शासन तथा प्रशासन को लगातार जागरुक करने की कोशिश करता रहा है, उनका कहना है कि आखिर घर खरीदारों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है? जिसने अपने खुन पसीने की कमाई लगाकर अपने सपनों के घर पाने के लिए दर-दर भटक रहा है। सरकार को इस बात की पड़ी है कि घर खरीदारों से स्टाम्प शुल्क वसूला जाय, लेकिन बिल्डर से नही लेना चाहती है। स्पोर्ट सिटी के लिए जो जमीन दिया गया था वहाँ भी बड़ा खेल हो चुका है आखिर इसका मानिटरिंग कौन कर रहा है? क्या योगी सरकार में हमने ऐसे प्रदेश के सपने देखे थे? मास्टर प्लान में 25 % मकान समाज के कमजोर वर्गों के लिए बनाने के लिए बिल्डर को एक्सट्रा एफआरए दिये गये थे लेकिन कोई बतायेगा कि वह मकान कहा बना है ?

अगर बिल्डर नें स्पोर्टस सिटी विकसित नही किया तो घर खरीदारों का क्या दोष ? क्या पहले नियम और शर्ते रखे गए थे या बिल्डर के द्वारा घर खरीदारों को यह बताया गया था ? अगर बिल्डर ने खेल का मैदान नही बनाया तो घर खरीदारों को उनका घर नही मिलेगा या फिर रजिस्ट्री नही किया जायेगा ? जब बिल्डर आवासीय फ्लैट विकसित कर रहा था, कन्सोर्टियम बिल्डर के द्वारा तो समय में निगरानी क्यों नही किया गया जबकि यह जिम्मेदारी प्राधिकरण के पास थी। क्या इतना बड़ा खेल खेलकर बिल्डर ऐसे ही निकल गया न तो जमीन का पैसे दिया और नही स्पोर्टस सिटी को विकसित किया। वर्तमान के योगी सरकार भी पूर्वती सरकार की तरह सिर्फ बैठक बैठक कर रही है न किसी का रजिस्ट्री हो पा रहा है और नही तो सीएजी रिपोर्ट को साझा किया जा रहा है।

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