लालच

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    लालच
    पंडित माधव प्रसाद काशी से वेद , उपनिष्ट तथा न्याय आदि की शिक्षा ग्रहन करके गांव को लौट रहे थे । तभी रास्ते मे एक व्यक्ति ने उनसे पाप का कारण पुछा । पंडित जी सोच मे पर गए । वे उसके प्रश्न का उतर न दे सके और आगे बढ गए । अब पंडित जी एक नगर से गुजर रहे थे । उनका मन उसी प्रश्न मे उलझा हुआ था
    उस नगर मे एक वेश्या ने पंडित जी को अपने झरोखे से देखा । उसके मन मे विचार आया कि यह व्यक्ति अत्यंत विव्दान दिखता है और कुछ चितित भी । अत: उसने अपने दासी को भेजकर उनकी चिंता का कारण जानना चाहा । दासी ने पंडित जी को सारी बात बताई । यह सुनकर पंडित जी बोले ,” मेरी परेशानी शास्त्रीय है जिसका उतर तुम्हारी मालकिन के पास नही है । “
    दासी ने पडिंत जी से रुकने को कहा । फिर अपनी मालकिन से मिलकर आई और बोली , “ मेरी मालकिन के पास आपकी परेशानी का उतर है ।“

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    पंडित जी उससे मिलने के लिए चल पड़े । वेश्या ने उनके लिए कच्चे अन्न एंव अग्नि का इंतजाम किया । पंडित जी वहां ठहर गए ।
    एक दिन वेश्या ने कहा ,” पंडित जी । आपके भोजन बनाने मे कष्ट होता है । यदि आप अनुमति दें तो मे आपके लिए भोजन बनाकर अपने पापो का प्रायश्चित करुं । इसके लिए मै आपको प्रतिदिन आपको दस स्वर्ण मुद्राए दान में दुंगी । “
    पंडित जी ने सोचा – यह स्त्री अब सुधरना चाहती है , फिर यहा कोई देखने वाला भी नही है , अत: इसकी बात मान लेनी चाहीए । मै प्रतिदिन इस पाप का प्रायश्चित कर लुगा । यह सब सोचकर पंडित जी तैयार हो गए दुसरे दिन उस वेश्या ने स्वदिष्ट पकवान बनाए और पंडित जी को बुलाया । पंडित जी जैसे ही भोजन करने बैठे ,वेश्या ने उनके सामने रखी थाली हटा दी । वह बोली , “पंडित जी । क्षमा करें , मै आप जैसे ब्राह्मण का धर्म और नियम भंग नही करना चाहती लेकिन इसी मे आपके प्रश्न का उतर है । आप जैसा पंडित जो दुसरो का छुआ अन्न भी नही ग्रंहन करना था ,एक वेश्या का अन्न लेने को तैयार हो गया –इसलिए पाप का मुल्य लालच ही है ।“