सूरज और अंधकार

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    एक बार अंधकार ने भगवान के पास जाकर शिकायत की,” भगवन्! यह सूरज मेरे पीछे बुरी तरह से पड़ा है। मैं इससे बहुत परेशान हूं। यह व्यर्थ में मेरा पीछा करता रहता है। मैं थोड़ी देर भी विश्राम नहीं ले पाता कि सूरज मुझे भगा देता हैं। हजारों वर्षों से ऐसा ही होता आ रहा हैं। आप ही बताइए कि मेरा क्या अपराध है ? मैंने सूरज का क्या बिगाड़ा  हैं जो यह मुझे परेशान करता रहता है।“

    अधंकार कि बात सुनकर भगवान ने कहा, सचमुच यह तो बहुत गलत बात है। मैं अभी सूर्यदेव को बुलाकर इस बारे मे पूछता हूँ।

    यह कहकर भगवान ने सूर्यदेव को बुलाया और कहा, सूर्यदेव! अधंकार ने सिकायत की है कि तुम बिना किसी उद्धेश्य  के उसे परेशान करते रहते हो। उसने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है जो तुम उसके पीछे पड़े रहते हो।“

    इस पर सूर्यदेव ने आश्चर्य चकित होकर कहा, प्रभु! यह आप क्या कह रहे है। मैंने तो अधंकार नामक किसी प्राणी को आज तक नहीं देखा, फिर उसे परेशान करने का प्रश्न कहां पैदा होता है। आप ही सोचए कि मैं जिस व्यक्ति को जानता तक नहीं उसें भला मैं क्यों परेशान करूंगा ? आप जरा अंधकार को बुलवाइए और उससे मेरा सामना करवाए। यदि अनजाने में मुझसे कोई गलती हो गई होगी तो में उसके लिए अधंकार से क्षमा मांग लूंगा।“

    भगवान ने अधंकार को पुकारा लेकिन वह गायब हो गया था।

    सूरज के समने भला अधंकार कैसे आता ? क्योकि अधंकार तो नकारत्मक स्थिति है। वस्तुत: सूरज का अस्तित्व है जबकि अधंकार का कोई अस्तित्व नहीं होता। सूरज कि अनुपस्थिति ही अधंकार है। मनुष्य के भय के संबंध मे भी यही भ्रम चला आ रहा है। हम भय को दूर करने की बहुत कोशिश करते है जबकि भय का कोई अस्तित्व ही नहीं है।