सराय

1 month ago Vatan Ki Awaz 0

काफी समय पहले इब्राहीम नामक एक सम्राट थे । उनका बहुत बड़ा साम्राज्य था । वे एक बड़े महल मे रहते थे । एक दिन उनके महल के सामने एक महात्मा ने अलख जगाई और दरबार से पुछा , क्या में इस सराय में ठहर सकता हु ?
दरबार ने कहा , महाराज !यह सराय नही राजमहल है ।
महात्मा बोले , तुम झुठ बोलते हो । यह राजमहल नही सराय है । “
बात बढ गया और सम्राट इब्राहीम के कानो तक पहुची । तब इब्राहीम ने आकर महात्मा से कहा , महात्मा ,जी यह हमारा निजी राजमहल है , इसे आप सराय कह कर मेरा अपमान कर रहे है । ,
महात्मा जी हंसे ,” सम्राट ! जब मै पहले यहां आया था तो यहा एक दुसरा बुढा आदमी ठहरा हुआ था ।,
सम्राट इब्राहीम बोले ,” वह मेरे वालिद साहब थे और यंहा ठहरे नही थे बल्कि इस महल में रहते थे ।
“उनसे पहले भी एक अन्य बुढा आदमी ठहरा हुआ था , इस सराय में । मेने खुद उससे बातें की थी और उसे समझाया भी था कि यह महल नही सराय है लेकिन रहता हो और कभी कोई उस जगह को सराय ही तो कहेगे सम्राट ईब्राहीम की आंखें खुल गई वे बोले महात्मा जी यह मेरा भ्रम है जो ठहरिए मै ईसे राजमहल कहता रहा वास्तव मे यह एक सराय ही है आइए आप इसमे ठहरिए मै कहीं अन्यत्र जाकर रहुंगा संसारी जीवन और सांसारिक सुख स्थायी नही है इस मर्म को जो समझ लतो है वह अहंकारशून्य जन निर्व्दंव्द तथा सच्चे आंनद का जीवन जीता है गीता मे कहा गया है यह मै हु यह मेरा है ऐसा दृष्टिकोण रखने वाले व्यक्ति कभी भी तृष्णा को नहीं त्याग सकता और जो तृष्णावान है , वह कभी भी धर्म ,ज्ञान एवं विवेक साथ नही रह सकता क्योकि तृष्णा कभी मनुष्य सतुष्ट नही होने देती । “