सबसे बड़ा मूर्ख

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    भौतिक उपलब्धियां जीवन में चाहे जितनी महत्वपूर्ण लगें, अंत में उनका मूल्य नगण्य ही सिध्द होता है। मृत्यु की तलवार धनी-निर्धन तथा ज्ञानी-मूर्ख-सब  पर समान रूप से चलती है। उसी व्यक्ति का जीवन सफल कहा जा सकता है जिसको अंत में सुख और आत्म-संतुष्टि प्राप्त होती है। उस अंतिम क्षण में सारे जिवन का हिसाब-किताब हो जाता है ऐसे समय सच्चा व्यक्ति संतुष्टि पाता है तथा भोगी व्यक्ति को काफी दुख भोगना पड़ता है।

    एक साहूकार को धन बटोरने का बड़ा शौक था। उसे अपनी योग्यता का बहुत घमंड था। जब साधु अथवा फकीर उसके द्वार पर आते तो वह उसकी सेवा करता और कभी-कभी चुटकी भी लेता।

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    एक दिन साहूकार ने एक महात्मा को भोजन कराया। फिर एक आईना देकर कहा,” महाराज! अपने प्रवास में आपको जो भी व्यक्ति सबसे बड़ा मूर्ख दिखे, उसे यह आईना दे दीजिएगा।“

    महात्मा वह आईना लेकर अपने गंतव्य की ओर चले गए।

    वर्षों बीत गए। वह महात्मा घूमते-फिरते पुन: साहूकार के नगर में पहुंचे। उन्होंने साहूकार ने घर जाकर देखा तो वह अंतिम शैया पर था। महात्मा ने उससे पूछा, “सेठ! क्या कोई ऐसी विध्या जानते हो जिससे तुम्हारे प्राण बच सकता है?”

    साहूकार बोला,” नही महाराज!”

    तब महात्मा ने अपने झोले में से वह आईना निकालाकर साहूकार को देते हुए कहा,”सेठ! मुझे अब तक सबसे बड़े मूर्ख तुम ही मिले हो जिसने धन के आगे अपनी जिंदगी व्यर्थ गंवा दी।“