संवेदनशीलता

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    संवेदनशीलता

    संवेदनशीलता मानव को मिली एक अमुल्य वस्तु है । किसा भी क्षेत्र की ऊँचाई पर पहुँचे मनुष्य के भीतर संवेदनशीलता का सागर अवश्य होता है- चाहे वह कवि,लेखक चित्रकार,समाज सुधारक या कोई संत ही क्यों न हो ?

    इटली के असीसी शहर निवासी संत फ्रांसिस का जीवन भी ऐसा ही था। उनका जन्म बारहवी शताब्दी में एक प्रसिद्ध व्यापारी के घर हुआ था। धन-वैभव और राग-रंग के साधनों की कोई कमी नही थी लेकिन विशाल कुल की लंबी सूची में फ्रांसिस की उदारता एवं संवेदनशीलता कुछ अलग ही थी।

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    एक दिन फ्राँसिस रेशमी वस्त्र की अपनी दुकान में बैठे एक धनवान ग्राहक से बातचीत कर रहे थे, तभी उन्हें दरवाजे पर एक भिखारी खड़ा दिखाई दिया । धनवान ग्राहक से सौदे की बातचीत हो जाने पर जब एक भिखारी की खोज-खबर की तो वह वहाँ नही था । ऐसे में उस भिखारी की कोई सहायता न कर पाने की आत्मग्लानि से उनका मन बहुत पीड़ित हुआ ।

    तत्पश्चात फ्रासिंस अपनी दुकान को खुला ही छोड़कर नगर की गलियों मे उस भिखारी को खोजने लगे। काफि देर बाद जब वह भिखारी उन्हें दिखाई दिया तो उनकी खुशी का ठिकाना न रहा ।

    फ्रांसीस दौड़कर उससे लिपट गए और बोले,”भाई! मुझसे बड़ी भूल हुई। रुपये पैसे के सौदे में फसकर आदमी अंधा हो जाता है ।

    इसके पश्चात फ्रांसिस ने अपना कोट तथा जेब का सारा धन उस भिखारी को दे दिया और संतोष की सांस ली।

    आगे चलकर वे संत फ्रांसिस आँफ असीसी के नाम से विख्यात हुए। इस महापुरुष ने मानव सेवा को साधना के अंग के रूप मे प्रतिष्ठित करके संवेदनशीलता की उपयोगिता को नया आयाम दिया।