शत्रु की सेवा

5 months ago Vatan Ki Awaz 0

यह उन दिनों की बात है जब अमेरिका में दास प्रथा जोरों पर थी। वहां बेकर नामक एक दास था । जो अपनी लगन, मेहनत और स्वमिभक्ति के कारण अपने मालिक का विश्वासपात्र वन गया था। एक दिन जब  उसने अपने मालिक से एक वृध्द एवं निर्बल दास को खरीदने की प्रार्थना की। बेकर का मन रखने के लिए मालिक ने उस दास को खरीद लिया और उससे पूछा,” बेकर! इतने सारे बलशाली दासों को थोड़कर तुमने इस वृध्द और निर्बल दास को खरीदने के लिए क्यो कहा?”

बेकर ने कहा,” मालिक! आप इसे मेरे साथ रहने दीजिए। मैं इसस् बेहतर ढंग से कास ले सकूंगा।“ मालिक। ने बेकर को अनुमति दे दी। बेकर उस वृध्द दास की सेवा करता और उसके प्रति दयालु रहता। मालिक यह सब देख रहा था।

एक  दिन मालिक ने पूछा,”बेकर! क्या यह तुम्हारा कोई संबंधी है?”

बेकर बोला,”नहीं मालिक!”

मालिक ने पूछा,”क्या यह तुम्हारा मित्र है।“

बेकर ने कहा,”नहीं मालिक! यह मेरा मित्र भी नहीं है।“

मालिक ने आश्चर्यसे पूछा,”तो फिर यह कौन है जिसकी तुम इतनी तत्परता से सेवा करते हो।“

बेकर ने कहा,” मालिक ! यह मेर शत्रु है। यही वह व्यक्ति है जिसने मुझे गांव से पकड़कर दास के रूप में बेच दिया था।  इसे मालूम नहीं कि मेरे लिए दास बनना कितना पीड़ादायक था। बाद में यह स्वयं भी पकड़ा गया। उस दिन जब यह बाजार में बिकने के लिए आया तो मैने इसे देखते ही पहचान लिया। यदपि यह मेरा शत्रु है परन्तु आज बृध्द और निर्बल होने के कारण दया का पात्र है। यही कारण है कि मैं इसकि इतनी सेब करता हूँ।“

बेकर की बात सुनकर मालिक बहुत प्रभावित हुआ। उसने दास प्रथा का विरोध करने का निर्णय किया और अगले दिन दोनों को दासता से मुक्ति दे दी।

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