विवेक का प्रयोग

5 months ago Vatan Ki Awaz 0

जापान के किसी गांव में एक समुराई बूढ़ा योध्दा रहता था। उसके पास कई युवा समुरई युध्दकला का प्रशिक्षण लेने आते थे। एक बार एक विदेशी  योध्दा उसे पराजित करने के लिए आया। बल के साथ ही विरोधी की कमजोरी भुलाने की उसमें अद्भुत क्षमता थी।  वह हमेशा विजयी होकर लौटता था। जब विदेशी योध्दा ने उससे मुकाबला ना करने की प्रार्थना की। लेकिन बूढ़े गुरू ने सबकी सलाह को नजरअंदाज कर  दिया और नियत दिन एक अखाड़े में दोनों योध्दा आमने-समने थे।

विदेशी योध्दा बूढ़े गुरू को अपमानित करने लगा। उसने उसे गुस्सा दिलाने के प्रयास में सैकड़ों गलियां दीं। लेकिन कई घंटों के अपमान के बाद भी बूढ़े गुरू ने न तो क्रोध दर्शाया और न ही खीझ जताई।

अंतत: विदेश योध्दा ने परेशान होकर बूढ़े गुरू के मुंह पर धूल उड़ाई और थूक दिया। इसके बावजूद बूढ़े गुरू ने न तो विरोध किया और न ही कोई प्रतिक्रिया व्यक्त की अब विदेशी योध्दा को अपनी हार का एहसास हो गया। वह खुद को पराजित मानकर सिर झुकाकर वहां से चला गया।

यह सब देखकर शिष्यों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि गुरू ने इतना अपमान सहकर हिना लड़े उसे कैसे जाने दिया ? उन्होंने पूछा,” गुरूदेव! उस विदेशी योध्दा ने जब आपको इतनी गालयां दीं तो आपने उसे कैसे सहन कर लिया ?”

बूढ़े गुरू ने उत्तर देने के बजाय उनसे प्रश्न किया,” यदि कोई व्यक्ति तुम्हें तोहफा दे और तुम उसे स्वीकार न करो तो वह किसका होगा ?”

शिष्यों ने कहा,” तोहफा देने वाले का ही होगा।“

बूढ़े गुरू ने कहा,” मैंने भी उसकी गालियों को स्वीकार नहीं किया।“

प्रतिक्रिया से बचकर हम अपनी ऊर्जा और समय को बचा सकते हैं। विवेक के प्रयोग से हम विरोधियों को भी सकारात्मक संदेश दे सकते हैं।

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