पिछड़ी और वंचित मुस्लिम आबादी यहाँ भी अपनी जमीन तलाश रहे है।

Spread the love

उम्मीद था कि मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड एक ऐसी संस्था बने जिसमें मुस्लिम समुदाय के सभी लोगों का प्रतिनिधित्व हो। लेकिन यहाँ भी मुस्लिम दलित अपनी जमीन ही तलाश रहे है। यहाँ पर भी वर्चस्व सिर्फ और सिर्फ राजनीति करने वालों का ही है।

मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड अपनी स्थानपना से लेेकर आज तक अनेक दावे करता आया है । जिसमें एक दावा यह भी था कि वह इस देश में बसने वाले सबसे बड़े अल्पसंख्यक समाज की अकेली संस्था है, जो उनके निजी व सामाजिक मूल्यों को , जो इस्लामी शरीयत कानून द्वारा निर्धारित किए गए है।

मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड मुस्लिमों के तरफ से देश के बाहरी और भीतरी मामलों में अपना सलाह देती है, इसके अलावा देखने समझने का कार्य भी करती है। इसके लिए समय समय पर सेमिनारों और बैठकों का आयोजन भी करती रहती है।

इस पर फैयाज अहमद जो कि एक समाजिक कार्यकर्ता और चिकित्सक है, सवाल करते है कि क्या बोर्ड का यह दावा सही है ? इसका जबाब बोर्ड के संगठनात्मक ढांचा से ही मिल जाता है। मसलको और फिरकों के भेट को स्वीकार करते हुए बोर्ड ने इसमें सारे मसलकों और फिरकों को जगह दी है, जो कि उनके मसलक /फिरके की आबादी के वजन के आधार पर तय है।

बोर्ड का अध्यक्ष हर बार सुन्नी संप्रदाय के देवबंदी/नदवी फिरके से आता है। ज्ञात रहे कि भारत में सुन्नियों की संख्या सबसे अधिक है और सुन्नियों में देवबंदी /नदवी समुदाय से वेशक संख्या में अधिक न हो फिर भी असर व प्रभाव की दृष्टि से वह सबसे बड़ा गुट है। बोर्ड का उपाध्यक्ष सदैव शिया संप्रदाय से होता है। हालांकि यह संप्रदाय संख्या बल में सुन्नी संप्रदाय के किसी भी फिरके से कम है , फिर भी वैचारिक आधार पर शिया हमप्ल्ला माने जाते है।

अब सवाल यह उठता है कि क्या भारतीय मुस्लिम समाज सिर्फ मसलकों/फिरकों में बंटा है? इसका जबाब नही है। मुस्लिम समाज नस्ली व जातिगत आधार पर भी विभाजित है। जहाँ सैय्यद , शेख , जुलाहा, धुनिया , धोबी , भटियाना, नट जैसी जातिया है। लेकिन बोर्ड अपने संगठन में इनमें से किसी भी जाति को मान्यता नही देता है।

शिकायत यही है कि बोर्ड किसी भी देशी मुस्लिम पसमांदा (पिछड़े, दलित, और आदिवासी) मुस्लिम जाति को उसकी जातिगत संख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व नही देता है। ऐसा भी नही कि बोर्ड भारतीय मुस्लिम के जातिगत भेद से अवगत नही है। वह खुद गैर कुफू यानी गैर -बराबरी में निकाह को भी न्यायोचित नही मानता है।

यानि एक शरीफ /उच्च/विदेशी जाति के मुस्लिम द्वारा एक रजील यानि निम्न देशी जाति के मुस्लिम से किए गए विवाह को न्यायंसंगत नही मानता है,जबकि रसूल अल्लाह ने दीनदारी ( धार्मिक कर्तव्य परायणता ) के आधार पर शादी करने का हुक्म दिया है। शिकायत यह भी है कि बोर्ड कथित रजील और जल्फ को, जिसे पसमांदा कहते है, अपने संगठन में प्रंनिधितव नही देता है।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि बोर्ड आधी आबादी यानी महिलाओं के प्रतिनिधित्व को भी नजरंदाज करता है। यह महिला प्रतिनिधित्व को न्यायोचित नहीं मानता, जबकि इसलामी इतिहास बताता है कि खलीफा उमर ने एक महिला सहाबी ( मुहम्मद रसूल अल्लाह की साथी ), शिफा बिंत अब्दुल्लाह अलअदविया को मदीना के बाजार का लोक वाणिज्य प्रशासनिक अधिकार बनाया था। वह इस्लामी इतिहास की पहली शिक्षिका और चिकित्सक भी थीं। खलीफा उमर (र.) उनसे सरकारी कामकाज में बराबर राय-मशविरा भी किया करते थे। हालांंकि, अब बोर्ड ने औरतो को शामिल तो कर लिया है, लेकिन यहां भी उच्च अशराफ वर्ग की औरतों को ही वरीयता दी गई है। बोर्ड में गैर-आलिम की भी भागीदारी होती है, जो ज्यादातर पूंजीवादी/ आधुनिक शिक्षाविद्/ कानूनी वादे होते है, लेकिन यहां भी कमोबेश अशराफ/ उच्च/ विदेशी वर्ग का ही वर्चस्व बना रहता है।

लगता है, बोर्ड के अशराफ उलेमा देसी पसमांदा मुस्लिम उलेमा की ओर से स्वयं ही प्रतिनिधित्व का दावा करते हैं और पसमांदा महिलाओं व पुरूषों को योग्य नहीं मानकर प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व नहीं प्रदान करते। हालांकि, ऐसा किसी को नहीं लगना चाहिए कि मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड केवल मुस्लिम उच्च वर्ग/ विदेशी नस्ल के अशराफ की प्रतिनिधि संस्था है। देश की कुल मुस्लिम आबादी में इस उच्च वर्ग की हिस्सेेदारी लगभग 10 फीसदी (लगभग तीन करोड़) हैं, बाकी 90 फीसदी (लगभग 13 करोड़ देसी पसमांदा मुस्लिम वंचित हैं- न तुम सदमे हमें देते, न यूं फरियाद हम करते/ न खुलते राज-ए-सर बस्ता, न यूं रुसवाइयां होतीं।

%d bloggers like this: