परीक्षा

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    पंडित नारायण दास के आश्रम में दूर-दूर से विध्दार्थी पढ़ने आते थे। वे अत्यंत कुशल आचार्य थे। उनकी मात्र एक पुत्री थी जिसे ने बहुत प्यार करते थे। एक दिन पंडित जी के मन में यह विचार आया- मैं अपने शिष्यों की परीक्षा लेकर देखूं कि इनमें से किसने मेरी शिक्षा आत्मसात किया है ? जो भी शिष्य उसमें सफल होगा, उसी से मैं अपनी पुत्री का विवाह कर दूंगा।

    दूसरे दिन पंडित जी ने अपने शिष्यों को बुलाकर कहा,” देखो, आज मैं तुम लोगों की परीक्षा लूंगा। तुम सब जानते हो कि मेरी एक युवा पुत्री है। तुम लोगों को उसकी शादी के लिए जेवर और कपड़े लाने हैं। भले ही चोरी करके लाओमगर एक बात अवश्य याद रखना- चोरी करते समय तुम्हें कोई भी न देखे।“

    पंडित जी की बात सुनकर सारे शिष्य इस काम मे लग गए। दो दिन बाद प्रत्येक शिष्य कोई न कोई सामान लेकर वापस लौटा। कोई शिष्य जेबर लेकर आया तो कोई शिष्य कपड़े और कोई बरतन आदि लाया तो कोई अन्य सामन। मगर एक शिष्य खाली हाथ लौट आया। वह बड़ा उदास था पंडित जी ने उससे पूछा,” वत्स! क्या बात है, तुम इतने उदास क्यो हो?  तुम तो एक अगूंठी तक चुराकर नहीं लाए जबकी तुम्हारे साथी कुछ न कुछ लेकर आए हैं।“

    वह शिष्य बोला,” गुरूदेव! मैंने आपकी शिक्षा को आत्मसात किया है। आपने कहा था कि चोरी का पा किसी को न चले। गुरूदेव! क्या आप नहीं जानते कि हम अपनी आत्मा से कभी कुछ नहीं छिपा सकते।“

    पंडित जी प्रसन्न होकर बोले,” वाह,बेटे भीम वास्तव में तुमने ही मेरी शिक्षा को आत्मसात किया है।“

    फिर पंडित जी ने सभी शिष्यों को बुलाकर भीम के विषय में बताया और कहा,” अब तुम लोग जिस-जिस घर से जो-जो सामान लाए हो, उसे वापस दे आओ। मैं अपनी बेटी की शादी भीम से कर रहा हूं क्योंकि यही एकमात्र ऐसा शिष्य है जो मेरी परीक्षा में बिल्कुल खरा उतरा है।“