नीति और धर्म

5 months ago Vatan Ki Awaz 0

महाभारत के समय की बात है । कौरवों और पांडवों में घमासान युध्द हो रहा था । कर्ण ने धनुर्धर अर्जुन को मारने की शपथ ले रखी थी । कर्ण बाण पर बाण चला रहा था । एक बार जब उसका बाण  अर्जन की ओर आया तो श्रीकृष्ण ने रथ को नीचे झुका दिया । बाण अर्जुन के मुकुट का ऊपरी भाग काटता हुआ निकल गया । यह देखकर कर्ण को बहुत आश्चर्य हुआ ।

तभी वह बाण लौटकर कर्ण की तरकस में आ गया और बोला ,” हे कर्ण ! तुम अगली वार जरा ठीक से निशाना लगाना । यदि मैं सही लक्ष्य पर गया तो तुम्हारे शत्रु को कोई नहीं बचा पाएगा । तुम अवश्य ही विजय प्राप्त करोगे और तुम्हारी प्रतिज्ञा भी पूरी हो जाएगी ।“

कर्ण का आश्चर्य बढ़ गया । उसने बाण से पूछा ,” आप मुझे अपना परिचय दें और यह बताएं कि अर्जुन को मारने में आपको इतनी रूचि क्यो हैं ?”

कर्ण के उस बाण पर सर्प था । वह प्रकट होकर बोला, “ हे कर्ण! मैं सामान्य बाण नहीं हूं। मैं महासर्प अश्वसेन हूं। एक बार अर्जुन ने खांडव वन को अग्नि से जला दिया था जिसमे मेरा पूरा परिवार जलकर मर गया था। अत: मैं अर्जुन से बदला लेना चाहता हूं। आज वह घड़ी आ गई है।“

कर्ण ने विनम्रतापूर्वक अश्वसेन से कहा,” मित्र! मैं तुम्हारी भावना की कद्र करता हूं लेकिन यह युध्द मैं अपने पुरूषार्थ से जीतना चाहता हूं। अनीति की विजय के बजाय मैं नीति के साथ लड़ते हुए मर जाना अच्छा समझता हूं।“

महासर्प अश्वसेन कर्ण की प्रशंसा करता हुआ बोला,” हे कर्ण! तुम वास्तव में धर्म में प्रतिष्ठित हो। तुम्हारी कीर्ति उज्ज्वल है।“

कर्ण की नीति और धर्म ही वह गुण है जो उन्हें महानायक का दर्जा दिलाती है। लक्ष्य की पूर्णता के लिए कृत संकल्प होने के बावजूद धर्म के साथ समझौता न करना ही सच्ची वीरता है। ऐसा ही वीर दुनिया को नई दिशा देता

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