दुर्गध

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    अवंतिका देश का राजा रवि सिंह महात्मा आशुतोष पर  बड़ी श्रद्धा-भक्ति रखता था। वह प्राय: उनसे मिलने के लिए वन में स्थित उनकी कुटिया पर भी जाता था रिव सिंह हर बार महात्मा को राजमहल आने का निमंत्रण देता लेकिन महात्मा आने से मना कर देते। एक दिन रवि सिंह ने जिद पकड़ ली। तब महात्मा बोले,” राजन! मुझे तुम्हारे महल में दुर्गंध अनुभव होती है।“

    रवि सिंह अनेप मवह हल में लौट आया लेकिन वह विचार करता रहा कि आखिर उसके महल में महात्मा जी को दुर्गंध क्यों अनुभव होती है? इसका क्या कारण है?

    एक दिन रवि सिंह महात्मा के पास पहुंचा। महात्मा रवि सिंह को घुमाने ले गए। दोनों जंगल से निकलकर एक गांव में पहुंचे। वहां चर्मकारों के इलाके में पशुओं का चमड़ा तैयार किया जा रहा था। इस कारण चारों तरफ दुर्गंध फैली थी। महत्मा वहां खड़े बच्चे, बूढ़े और नौजवानों को देख रहे थे। लेकिन दुर्गंध के कारण रवि सिंह बेहाल था। जब दुर्गंध असम्ह होने लगी तो रवि सिंह बोला,” महाराज! यहां तो बड़ी दुर्गंध आ रही है। यहां से चलिए।“

    महात्मा बोले,” राजन! यहां बच्चे, बूढ़े तथा नौजवान सब हैं लेकिन दुर्गंध सिर्फ तुम्हें ही अनुभव हो रही है।“

    रवि सिंह बोला,” ये लोग इसके अभ्यस्त हो गए हैं। मैं तो यहां थोड़ी देर भी नहीं ठहर सकता।“ यह कहकर रवि सिंह चलने लगा।

    महात्मा ने कहा,” राजन! बस ऐसा ही हाल तुम्हारे महल का है जहां भोग और विषय की गंध फैली रहती है। तुम इसके अभ्यस्त हो गए हो, अत: उसकी प्रतीति नहीं होती।लेकिन मुझे तो वहां जाने की कल्पना से ही कष्ट होने लगता है।“

    जब हम अपने जीवन में किसी वातावरण, आदत या व्यवहार के आदी हो जाते हैं तो हम उसकी भली-भांति परीक्षा करने की क्षमता खो देते है। हमारी दृष्टि संकुचित हो जाती है। इसलिए जब तक वातावरण से दूर होकर विचार, कर्म और जीवन की गतिविधियों का चितंन नहीं किया जाता तब तक हमें सही-गलत का भान नहीं होता।